अगस्त 1976 में मुंबई के खार-डांडा तट पर कस्टम अधिकारियों ने तस्करी की एक बड़ी खेप पकड़ी थी, जिसमें 12 बोरियों में हजारों घड़ियाँ मौजूद थीं। यह घटना उस दौर में समुद्री तस्करी के जोखिमों को दर्शाती है।
मुख्य बातें
- मुंबई कस्टम विभाग ने खार-डांडा के पास 12 जूट की बोरियों से घड़ियाँ जब्त कीं।
- कुल 13,500 घड़ियों की कीमत उस समय 10 लाख रुपये से अधिक थी।
- मानसून के दौरान तस्करी के बावजूद यह एक बड़ी सफलता थी।
आज से लगभग पांच दशक पहले, अगस्त 1976 में मुंबई के समुद्री तटों पर एक सनसनीखेज मामला सामने आया था। बॉम्बे कस्टम विभाग ने बांद्रा के उत्तरी उपनगर के पास स्थित खार-डांडा लाइटहाउस के पास के पथरीले इलाके से तस्करी की गई घड़ियों की एक विशाल खेप बरामद की थी।
कस्टम कलेक्टर (प्रिवेंटिव) श्री एम.एल. वाधवान ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि ये घड़ियाँ 12 जूट की बोरियों में छिपाकर रखी गई थीं। इन बोरियों के भीतर वाटरप्रूफ सेलफोन बैग थे, जिनमें घड़ियों को 500 या 1,200 के समूहों में करीने से पैक किया गया था। बरामद की गई घड़ियों में पुरुषों और महिलाओं, दोनों के लिए विभिन्न प्रकार के मॉडल शामिल थे।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह मामला उस समय की तस्करी की जटिलता को दर्शाता है। श्री वाधवान के अनुसार, यह उस सीजन की सबसे बड़ी बरामदगी थी। जुलाई का महीना आमतौर पर तस्करी के लिए 'लीन मंथ' माना जाता है क्योंकि मानसून की तेज हवाएं और ऊंची लहरें समुद्री तस्करी को बेहद जोखिम भरा बना देती हैं। पश्चिम एशिया से मुंबई के तटों तक 'धो' (Dhows) जहाजों का आना इस मौसम में जानलेवा हो सकता था।
मानसून के दौरान समुद्र की लहरों को चुनौती देना तस्करों के लिए आत्मघाती कदम था, फिर भी यह खेप पकड़ी गई।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
1970 के दशक में मुंबई का समुद्री तट तस्करी का एक प्रमुख केंद्र हुआ करता था। उस समय विदेशी घड़ियों और इलेक्ट्रॉनिक्स की भारी मांग थी, जिससे अवैध व्यापार को बढ़ावा मिलता था। खार-डांडा जैसे इलाके, जो चट्टानी और दुर्गम थे, तस्करों के लिए छिपने के आदर्श स्थान हुआ करते थे।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. यह खेप कहाँ से बरामद की गई थी?
यह खेप मुंबई के बांद्रा के पास खार-डांडा लाइटहाउस के पास से बरामद की गई थी।
2. कुल कितनी घड़ियाँ जब्त की गई थीं?
कस्टम अधिकारियों ने कुल 13,500 घड़ियाँ जब्त की थीं।