मणिपुर में हाईवे पर जबरन वसूली का जाल कई दशकों से चल रहा है, जो हालिया जातीय हिंसा से अधिक जटिल है। इस नेटवर्क को राज्यत्व के कवच में छिपाया गया है, जिससे सुरक्षा स्थिति और बिगड़ रही है।
मुख्य बिंदु
- हाईवे वसूली नेटवर्क दशकों से संचालित
- इंसर्जेंट समूहों ने इसे राज्यत्व के रूप में प्रस्तुत किया
- जातीय संघर्ष इससे पीछे के कारण नहीं
मणिपुर में, विभिन्न इंसर्जेंट समूहों ने राज्यत्व की भाषा में खुद को ढालते हुए एक व्यापक जबरन वसूली प्रणाली स्थापित की है। यह प्रणाली 2023 में मई में उभरी जातीय हिंसा से काफी पहले से ही कार्यरत थी, लेकिन हालिया हिंसा ने इसे अधिक उजागर किया है।
यह जाल मुख्यतः राष्ट्रीय राजमार्गों पर कार्य करता है, जहाँ समूह चालक और मालवाहक कंपनियों से भारी रकम वसूलते हैं, अक्सर हिंसा या धमकी के साथ। इस प्रकार की आर्थिक दबाव ने स्थानीय व्यापार और परिवहन को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में देखा जाए तो 1990 के दशक से ही मणिपुर में विभिन्न एंटी-स्टेट समूहों ने अपनी आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए समान मॉडल अपनाए थे। समय के साथ यह मॉडल अधिक व्यवस्थित और सशस्त्र हो गया, जिससे राज्य की सुरक्षा एजेंसियों के लिए इसे रोकना कठिन हो गया।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia विश्लेषण दर्शाता है कि इस प्रकार की आर्थिक उत्पीड़न न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाती है, बल्कि सामाजिक तनाव को भी बढ़ावा देती है, जिससे जातीय संघर्ष की सतह पर नया दबाव बनता है।
"हाईवे वसूली नेटवर्क की जड़ें गहरी हैं और इसे खत्म करने के लिए व्यापक सुरक्षा सुधार आवश्यक हैं," कहता है सुरक्षा विश्लेषक डॉ. अजय सिंह।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: क्या सरकार ने इस जाल को तोड़ने के लिये कोई विशेष योजना बनाई है?
उत्तर: वर्तमान में कई सुरक्षा ऑपरेशन चल रहे हैं, लेकिन पूर्ण समाधान अभी भी लंबित है।
प्रश्न 2: इस वसूली का आर्थिक प्रभाव कितना गहरा है?
उत्तर: अनुमानित रूप से, सालाना करोड़ों रुपये की हानि स्थानीय व्यापार और परिवहन कंपनियों को हो रही है।