अंकारा में हुए नाटो शिखर सम्मेलन ने यूरोप के रक्षा पुनरुत्थान को तेज़ किया, जिससे भारत को नई रणनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। 2035 तक 5% GDP रक्षा खर्च की प्रतिबद्धता अंतरराष्ट्रीय हथियार बाजार को बिक्री‑उन्मुख बना रही है।
मुख्य बिंदु
- नाटो ने 2035 तक सभी सदस्य देशों से 5% GDP रक्षा खर्च का लक्ष्य तय किया।
- यूरोप में उच्च‑तकनीकी रक्षा उद्योग का पुनर्निर्माण तेज़ हो रहा है।
- भारतीय रक्षा खरीद पर यूरोपीय मांग के कारण संभावित कीमत बढ़ोतरी और आपूर्ति बाधा।
अंकारा, तुर्की में 7‑8 जुलाई 2026 को नाटो के 32 सदस्य देशों के प्रमुखों ने शिखर सम्मेलन किया, जिसका उद्देश्य 2025 हेग शिखर के बाद की प्रगति का मूल्यांकन और भविष्य की रणनीतिक दिशा तय करना था। इस बैठक को नाटो की सबसे सफल सम्मेलनों में से एक माना गया, हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के दृढ़तापूर्ण बयान भी इस पर छाए रहे।
समिट में चार मुख्य प्रतिबद्धताएँ सामने आईं: (1) अनुच्छेद‑5 के तहत सामूहिक रक्षा का "लौह‑संकल्प"; (2) 2035 तक सभी सदस्य देशों से 5% GDP रक्षा खर्च का लक्ष्य – जो पहले के 2% से तीन गुना अधिक है; (3) यूक्रेन के लिए निरंतर समर्थन; (4) पूरे यूरोप में एक उच्च‑तकनीकी रक्षा औद्योगिक आधार (DIB) का निर्माण। इन लक्ष्यों को लागू करने के लिए निवेश, औद्योगिक क्षमता और नवाचार पर विशेष ज़ोर दिया गया।
इतिहास में नाटो का विस्तार अक्सर रूसी प्रतिरोध का कारण रहा है। 2022 में रूस ने यूक्रेन पर आक्रमण किया, partly fearing कि यूक्रेन नाटो में शामिल होगा, जिससे गठबंधन के सदस्य 31‑32 तक बढ़ेंगे। इस विस्तार को नाटो ने "रणनीतिक अनुकूलन" कहा है, जबकि वास्तविकता में यह यूरोप के रक्षा बाजार को पुनः आकार दे रहा है।
यूरोपीय रक्षा उद्योग पहले ही 5% खर्च लक्ष्य से जूझ रहा था; प्रमुख कंपनियों जैसे MBDA और Rheinmetall ने गोला‑बारूद की कमी की चेतावनी दी है। अमेरिकी‑इज़राइल के ऑपरेशन एपिक फ्यूरी में 850 से अधिक टॉमहॉक मिसाइलों का उपयोग हुआ, जिससे यूरोपीय मांग का दबाव और बढ़ गया। इस स्थिति में, भारत जैसे बड़े हथियार खरीदारों को कीमतों में उछाल और डिलीवरी में देरी का सामना करना पड़ सकता है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia विश्लेषण दिखाता है कि यूरोप की रक्षा‑उद्योग पुनरुज्जीवन और 5% खर्च प्रतिबद्धता भारत के लिए दो‑तरफ़ा जोखिम पैदा करती है: एक ओर यूरोपीय आपूर्तिकर्ताओं की प्राथमिकता बदल जाएगी, दूसरी ओर अमेरिकी निर्यात पर निर्भरता बढ़ेगी, जिससे रणनीतिक आत्मनिर्भरता पर असर पड़ेगा।
"नाटो की बढ़ती खर्चीली नीति अंतरराष्ट्रीय हथियार बाजार को खरीदार‑उन्मुख से विक्रेता‑उन्मुख बना रही है, जो भारत के दीर्घकालिक रक्षा योजना के लिए चेतावनी संकेत है।"
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: नाटो के 5% खर्च लक्ष्य से भारत की हथियार खरीद पर कैसे असर पड़ेगा?
उत्तर: यूरोपीय निर्माताओं की प्राथमिकता बदलने से आपूर्ति में देरी और कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना है, जिससे भारत को वैकल्पिक स्रोतों या घरेलू उत्पादन में निवेश करना पड़ सकता है।
प्रश्न 2: भारत को इस नए बाजार प्रवाह के लिए क्या रणनीतिक कदम उठाने चाहिए?
उत्तर: भारत को अपने रक्षा औद्योगिक आधार को सुदृढ़ करना, द्विपक्षीय सहयोग बढ़ाना और दीर्घकालिक अनुबंधों के माध्यम से मूल्य स्थिरता सुनिश्चित करनी चाहिए।