भारत में व्यक्तिगत कानूनों को धर्म, लिंग और लैंगिक अभिविन्यास से मुक्त करके एक समान नागरिक संहिता की तत्काल आवश्यकता है। 22वें विधि आयोग की प्रस्तावना इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
मुख्य बिंदु
- विधि आयोग ने समान नागरिक संहिता पर सार्वजनिक प्रतिक्रिया आमंत्रित की है।
- वर्तमान व्यक्तिगत कानून धर्म‑आधारित और पैत्रियार्कल हैं।
- एक धर्मनिरपेक्ष संहिता लोकतांत्रिक सिद्धांतों के साथ संगत होगी।
विधि आयोग की नई पहल
भारत के 22वें विधि आयोग ने एक समान नागरिक संहिता (UCC) पर सार्वजनिक प्रतिक्रिया के लिए आमंत्रण जारी किया है। यह कदम लंबे समय से चल रही बहस को औपचारिक मंच देता है, जहाँ नागरिकों को उनके व्यक्तिगत कानूनों पर पहले कभी नहीं सुनाया गया था।
उपनिवेशवादी विरासत और उसका प्रभाव
वर्तमान व्यक्तिगत कानून ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन द्वारा विभिन्न धर्मों के लिए अलग‑अलग रूप में तैयार किए गये थे। इन नियमों ने हिन्दू‑मुस्लिम द्विआधारी ढांचा बनाया, जो आज भी कई असमानताओं को कायम रखता है।
पैत्रियार्कल संरचना का निरंतर प्रभाव
धर्म‑आधारित कानूनों में पुरुषों को स्पष्ट विशेषाधिकार मिला है – जैसे कि हिन्दू अनिवार्य परिवार में केवल पुरुष ही कर्ता बन सकता है, मुस्लिम तलाकशुदा महिलाएँ सीमित रखरखाव के हकदार हैं, और कई जनजातियों में महिलाओं को विरासत का अधिकार नहीं मिलता। इसका अर्थ है कि महिलाओं के सशक्तिकरण की दृष्टि से भारत का निजी संहिता पहले से ही असमान है।
समलैंगिक समुदाय की अनदेखी
ब्रिटिश शासकों ने LGBTQ+ समुदाय को नज़रअंदाज़ कर दिया, उन्हें न तो कोई व्यक्तिगत कानून मिला और न ही उनके अधिकारों की सुरक्षा। आज की लोकतांत्रिक भारत में यह एक बड़ी खामी बनी हुई है।
Why This Matters
BozokMedia analysis shows that a secular, uniform civil code would align India’s legal framework with constitutional values of liberty, equality and dignity, eliminating religious bias while strengthening social cohesion.
"एक सार्वभौमिक नागरिक संहिता न केवल लैंगिक समानता को सुनिश्चित करेगी, बल्कि भारत को एक सच्ची धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र के रूप में स्थापित करेगी," कहते हैं प्रो. रजत वर्मा, संवैधानिक कानून विशेषज्ञ।
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: समान नागरिक संहिता क्यों आवश्यक है?
उत्तर: यह सभी नागरिकों को धर्म, लिंग या यौन अभिविन्यास से स्वतंत्र समान अधिकार प्रदान करती है, जिससे न्याय में समानता आती है।
प्रश्न 2: क्या यह धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन करेगा?
उत्तर: नहीं, धार्मिक स्वतंत्रता का अर्थ है विश्वास की चुनिंदा आज़ादी, जबकि व्यक्तिगत कानूनी अधिकारों को धर्म‑आधारित नियमों से अलग रखना संविधान के सिद्धांतों के अनुरूप है।