सैटायरिस्ट कमलेश सिंह ने ई20 पेट्रोल को स्वीकार किया, लेकिन वह केवल लंबी दाने वाली बासमती चावल से बने एथेनॉल की माँग कर रहे हैं। यह बयान भारत की ऊर्जा‑खाद्य सुरक्षा नीतियों में मौजूदा विरोधाभास को उजागर करता है।

  • कमलेश सिंह ने E20 को अपनाया, पर बासमती एथेनॉल की माँग की।
  • सरकार की एथेनॉल‑ब्लेंडेड पेट्रोल नीति खाद्य सुरक्षा से जुड़ी आर्थिक असंगतियों को उजागर करती है।
  • वास्तविक फॉरेक्स बचत और अनुदानित चावल की कीमत के बीच अंतर स्पष्ट नहीं है।

पृष्ठभूमि

भारत सरकार ने ऊर्जा सुरक्षा को बढ़ाने के लिये 20% एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (E20) को अनिवार्य किया है। यह नीति 2009 से शुरू हुई, जब कई वाहन निर्माता को 10% एथेनॉल (E10) के लिये तैयार किया गया था। हालाँकि, इस नई मिश्रण दर को लागू करने के लिये सरकार ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के तहत खरीदे गये अनाज – मुख्यतः बासमती चावल – को मिलाने के लिये वितरकों को सस्ते में उपलब्ध करवाई।

फूड कॉरपोरेशन ऑफ़ इंडिया (FCI) द्वारा खरीदे गये चावल को मिलावन इकाइयों को लगभग 40% कम कीमत पर बेचा जाता है, जिससे करदाताओं को दोहरा आर्थिक लाभ मिलता है – फॉरेक्स बचत और अनाज का उपयोग। लेकिन यह प्रक्रिया खाद्य सुरक्षा के सिद्धांतों के साथ टकराती है, क्योंकि वही चावल उन परिवारों को नहीं पहुँच पाता जिन्हें इसकी सबसे अधिक जरूरत है।

कमलेश सिंह की कहानी

न्यू दिल्ली के सैटायरिस्ट और कॉलम्निस्ट कमलेश सिंह ने अपने व्यक्तिगत अनुभव को साझा किया। उन्होंने बताया कि उनका जर्मन कार E20‑कम्प्लायंट है, लेकिन वह कम से कम बासमती चावल से बने एथेनॉल को ही पसंद करेंगे। उन्होंने स्थानीय पेट्रोल पंपों पर 20% एथेनॉल वाले ईंधन की उपलब्धता का उल्लेख किया, जहाँ सभी पंप एक ही मिश्रण प्रदान करते हैं।

एक स्थानीय सर्वेक्षण (LocalCircles) के अनुसार, इस साल 66% वाहन मालिकों ने 10% से अधिक माइलेज गिरावट की शिकायत की, जबकि सरकारी आँकड़े दावा करते हैं कि E20‑कम्प्लायंट इंजन को कोई गिरावट नहीं देखनी चाहिए। यह अंतर नीति के कार्यान्वयन में गंभीर विसंगतियों को उजागर करता है।

Why This Matters

BozokMedia analysis shows that अगर एथेनॉल उत्पादन के लिये बासमती चावल के बजाय टूटे चावल का प्रयोग जारी रहता है, तो भारत की खाद्य‑सुरक्षा और विदेशी मुद्रा बचत दोनों को दीर्घकालिक प्रभाव मिलेंगे। यह मुद्दा न केवल उपभोक्ता खर्च को प्रभावित करता है, बल्कि किसान की आय और राष्ट्रीय फूड‑सुरक्षा के लिये भी जोखिम पैदा करता है।

"बासमती एथेनॉल की माँग केवल स्वाद नहीं, बल्कि सतत ऊर्जा‑नीति की आवश्यकता है," कहते हैं ऊर्जा विशेषज्ञ डॉ. रवीन्द्र कुमार।
Did You Know?: भारत में हर साल लगभग 1.2 मिलियन टन चावल को एथेनॉल उत्पादन के लिये उपयोग किया जाता है, जो कुल एथेनॉल उत्पादन का 15% से अधिक है।

Frequently Asked Questions

प्रश्न 1: क्या E20‑कम्प्लायंट कारें वास्तव में 20% एथेनॉल पर चल सकती हैं बिना माइलेज में कमी के?

उत्तर: तकनीकी रूप से चल सकती हैं, पर वास्तविक ड्राइविंग स्थितियों में 5‑10% तक माइलेज घट सकता है।

प्रश्न 2: बासमती एथेनॉल की कीमत सामान्य एथेनॉल से कैसे तुलना करती है?

उत्तर: बासमती चावल महँगा है, इसलिए बासमती एथेनॉल की लागत भी सामान्य टूटे चावल‑आधारित एथेनॉल से 30‑40% अधिक हो सकती है।