केंद्रीय गृह मंत्रालय ने गोरखालैंड मुद्दे के स्थायी राजनीतिक समाधान के लिए एक उच्च‑स्तरीय पैनल गठित किया है, जिसकी जड़ें 1907 में दार्जिलिंग हिलमैन एसोसिएशन की याचिका में हैं। यह लेख शताब्दी‑लंबी संघर्ष, प्रमुख मोड़ और वर्तमान राजनीति को विस्तृत रूप से दर्शाता है।
- गोरखालैंड की राज्य मांग 1907 से चलती आ रही है।
- 2026 में केंद्र ने स्थायी समाधान के लिए एक नई समिति बनाई।
- राजनीतिक गतिशीलता में बीमल गुरुंग, बीजीपीएम और बीजेपी की भूमिका प्रमुख है।
इतिहास की झलक
दार्जिलिंग, कालिम्पोंग, कुर्सेओंग, तेरेई और दारों के क्षेत्रों की जनसंख्या ने 1907 में दार्जिलिंग हिलमैन एसोसिएशन के मुखिया सोनाम वांगेल लादेन ला के नेतृत्व में मिंटो‑मॉरले सुधार समिति को एक औपचारिक याचिका प्रस्तुत की, जिसमें बंगाल से अलग प्रशासनिक इकाई की माँग की गई थी।
ब्रिटिश काल और स्वतंत्रता‑पश्चात चरण
इसके बाद गोरखा ऑफिसर्स एसोसिएशन और कुर्सेओंग गोरखा लाइब्रेरी जैसी संगठनों ने 1929 में सायमन कमीशन तथा सर सैमुअल होयर, लॉर्ड पेथिक‑लॉरेंस को अपने प्रस्ताव भेजे। 1947 में सीपीआई ने "गोरखस्थान" के लिए एक मेमोरेंडम जवारलाल नेहरू और लियाकत अली खान को सौंपा।
आधुनिक आंदोलन का उदय
1980 के दशक में सबास घिसिंग ने गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट (जीएनएलएफ) की स्थापना की और "गोरखालैंड" शब्द को लोकप्रिय बनाया। 1988 में दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल (डीजीएचसी) बनी, जो 23 साल तक क्षेत्र का अर्ध‑स्वायत्त प्रशासनिक निकाय रहा।
नई राजनीतिक परिदृश्य
2007 में बिमल गुरुंग ने गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम) की स्थापना की, जिससे 2011 में गोरखा टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन (जीटीए) का गठन हुआ। 2017 में बंगाली को अनिवार्य भाषा घोषित करने पर हुए प्रकोप में 104 दिन तक हिंसा छिड़ी, 11 प्रदर्शनकारियों की मौत और पर्यटन उद्योग का ठहराव हुआ।
वर्तमान राजनीतिक संतुलन
प्रकाशित 2022 के जीटीए चुनाव में बिमल गुरुंग के टूटे हुए पक्ष के नेता अनित थापा के बने भारतीय गोरखा लोकतांत्रिक मोर्चा (बीजीपीएम) ने 45 में से 27 सीटें जीतीं। जबकि भाजपा ने 2019, 2024 लोकसभा और 2026 विधानसभा चुनावों में दार्जिलिंग, कालिम्पोंग और कुर्सेओंग सभी सीटें जीतकर अपनी पकड़ मजबूत की।
Why This Matters
BozokMedia analysis shows that the formation of the new panel signals a pivotal shift from ad‑hoc protest management to a structured constitutional dialogue, potentially reshaping West Bengal’s ethnic politics for decades.
"एक स्थायी समाधान के बिना गोरखा आंदोलन की असंतुष्टि सामाजिक अस्थिरता को बढ़ा सकती है," दक्षिण एशिया अध्ययन विशेषज्ञ डॉ. अंजलि कुमार ने कहा।
Frequently Asked Questions
Q1: क्या गोरखालैंड को राज्य दर्जा मिलेगा?
A: यह नई समिति के निष्कर्षों और संविधानिक प्रक्रियाओं पर निर्भर करेगा।
Q2: गोरखा समुदाय को अनुसूचित जनजाति (एसटी) दर्जा कब मिल सकता है?
A: समिति ने 11 प्रमुख गोरखा समुदायों के लिए एसटी दर्जा देने की सिफारिश की है, परन्तु इसे विधायी मंजूरी की आवश्यकता होगी।