हिरण मुखर्जी ने अपने पुस्तक ‘परलेमेंट का चित्रण’ में संसद के नैतिक पतन को उजागर किया है। लेखक मानते हैं कि संसद अब केवल औपचारिक संस्था नहीं, बल्कि राष्ट्र के चेतना के रूप में अपने मूल कार्य से दूर हो रही है।
- संसद का नैतिक आत्मविश्वास घट रहा है
- कार्यकारी शक्ति का बढ़ता प्रभुत्व
- विचार-विमर्श और संस्थागत स्मृति का क्षय
परिचय
हिरण मुखर्जी की पुस्तक ‘Portrait of Parliament: Reflections and Recollections (1952–77)’ भारतीय लोकतंत्र के सबसे महत्वपूर्ण संस्थान – संसद – के वर्तमान संकट पर एक तीखा विश्लेषण पेश करती है। लेखक, जो स्वयं एक अनुभवी संसद सदस्य थे, इस बात पर प्रकाश डालते हैं कि क्या संसद अभी भी राष्ट्र की नैतिक चेतना के रूप में काम कर सकती है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारतीय संसद का निर्माण 1950 के संविधान के साथ हुआ, जब इसे कार्यकारी शाखा से स्वतंत्र, बहु-स्तरीय संवाद मंच के रूप में कल्पना किया गया था। शुरुआती दशकों में यह शक्ति के संतुलन को बनाए रखने में सफल रही, लेकिन समय के साथ कार्यकारी शाखा का प्रभुत्व बढ़ा।
मुख्य लक्षण
मुखर्जी ने चार प्रमुख लक्षणों को उजागर किया है: कार्यकारी शक्ति का एकत्रीकरण, बहस की कमी, संस्थागत स्मृति का क्षरण, और समिति प्रणाली का घटती भूमिका। इन सभी ने संसद को एक मात्र “स्वीकृति मंच” में बदल दिया है।
Why This Matters
BozokMedia analysis shows that the erosion of parliamentary deliberation directly impacts policy quality, citizen trust, and India’s standing in global democratic indices. जब संसद की निगरानी क्षमता कमज़ोर होगी, तो अधिकार की दुरुपयोग की संभावना बढ़ेगी।
“संसद को केवल कानून बनाने की मशीन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय नैतिकता की जाँच का माध्यम होना चाहिए,” कहा राजनीतिक विज्ञान के प्रोफेसर अंशु वर्मा।
समकालीन प्रभाव
आज की संसद में बहस का स्वर तेज़ी से सोशल मीडिया की ओर मुड़ रहा है, जहाँ भाषणों को ‘वायरल’ बनाने के लिए तैयार किया जाता है, न कि विचारों को गहरा करने के लिए। इससे नागरिकों की वास्तविक समझ में कमी आती है और लोकतांत्रिक संवाद का स्वरूप बदल जाता है।
भविष्य की राह
मुखर्जी की चेतावनी के अनुसार, संस्थागत रीसेट केवल बड़े राजनीतिक इरादों से नहीं, बल्कि छोटे‑छोटे नैतिक सिद्धांतों की पुनर्स्थापना से संभव है। संसद को फिर से राष्ट्रीय नैतिकता का प्रतिबिंब बनाना आवश्यक है।
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: क्या संसद की वर्तमान भूमिका वास्तव में कार्यकारी के अधीन है?
उत्तर: कई मामलों में हाँ, क्योंकि अधिकांश विधायी प्रस्ताव पहले ही कार्यकारी द्वारा तैयार किए जा रहे हैं और संसद केवल औपचारिक स्वीकृति देती है।
प्रश्न 2: संसद को पुनर्जीवित करने के लिए कौन‑से कदम उठाए जा सकते हैं?
उत्तर: समिति कार्य को सुदृढ़ करना, बहस की अवधि बढ़ाना, और पारदर्शी अभिलेखों के माध्यम से संस्थागत स्मृति को संरक्षित करना प्रमुख उपाय हैं।