पूर्व तिब्बती प्रधानमंत्री लॉब्संग संगाय ने हालिया हिमालयी बाढ़ के बाद चीन के कृत्यों पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने बताया कि बीजिंग ने इंटरनेट बंद कर दिया और अंतरराष्ट्रीय निरीक्षणकों को रोक दिया।
- चीन ने बाढ़ के बाद इंटरनेट और विदेशी पत्रकारों को प्रतिबंधित किया
- संगाय का अनुमान है कि 100 से अधिक तिब्बती मारे गए
- भारी इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं को पर्यावरणीय विनाश का कारण बताया गया
पूर्व तिब्बती सरकार-इन-एक्साइल के प्रधान मंत्री लॉब्संग संगाय ने एक साक्षात्कार में हालिया हिमालयी बाढ़ के बाद चीन के व्यवहार पर कड़ी निंदा की। उन्होंने कहा, "चीन की सरकार निश्चित रूप से कुछ छुपा रही है," और बताया कि बीजिंग ने आपदा के 24 घंटे बाद ही इंटरनेट संचार को बंद कर दिया।
संगाय ने यह भी उजागर किया कि विदेशी पत्रकार, संयुक्त राष्ट्र निरीक्षक और जल विशेषज्ञों को प्रभावित क्षेत्रों में प्रवेश से रोका गया। उनका अनुमान है कि इस त्रासदी में कम से कम 100 तिब्बती नागरिकों की जान गई है।
उन्होंने चीन के बड़े पैमाने पर सड़क, रेल और ड्राई पोर्ट निर्माण को हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को अस्थिर करने और हिमस्खलन को प्रेरित करने का मुख्य कारण बताया। तिब्बत, जो एशिया का जल टावर माना जाता है, पर चीन ने जल साझाकरण पर संयुक्त राष्ट्र के संधि पर हस्ताक्षर करने से इनकार किया है।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण दिखाता है कि यदि चीन के पर्यावरणीय उल्लंघन पर अंतरराष्ट्रीय दबाव नहीं बढ़ा, तो downstream देशों—जैसे भारत, नेपाल, भूटान और बांग्लादेश—को गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ेगा। यह मुद्दा न केवल क्षेत्रीय सुरक्षा बल्कि वैश्विक जल सुरक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण है।
"हिमालयी जल स्रोतों का संरक्षण अंतरराष्ट्रीय सहयोग के बिना असंभव है," जल विज्ञान विशेषज्ञ डॉ. अंजु पाटिल ने कहा।
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: क्या चीन ने संयुक्त राष्ट्र जल साझाकरण संधि पर हस्ताक्षर करने से इनकार किया है?
उत्तर: हाँ, वर्तमान में चीन ने इस संधि को नहीं माना है, जिससे जल सुरक्षा पर अंतरराष्ट्रीय चिंता बढ़ी है।
प्रश्न 2: इस बाढ़ से प्रभावित सबसे अधिक किन देशों को नुकसान हुआ?
उत्तर: तिब्बत के साथ-साथ भारत, नेपाल, भूटान और बांग्लादेश को downstream जल प्रवाह में कमी के कारण गंभीर प्रभाव पड़ेगा।