भारत में डॉक्टरों और अस्पतालों की संख्या बढ़ने के बावजूद सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय GDP के सिर्फ 1.43% पर है, जो 2017 की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के 2.5% लक्ष्य से काफी पीछे है।

  • सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय GDP का केवल 1.43% है, 2.5% लक्ष्य से कम।
  • रोगी 60% से अधिक निजी अस्पतालों पर निर्भर हैं, जहाँ लागत 8 गुना अधिक है।
  • वित्तीय संरक्षण के बावजूद, 40 करोड़ भारतीय अभी भी व्यापक कवरेज से बाहर हैं।

पृष्ठभूमि

पिछले बारह वर्ष में BJP सरकार ने चिकित्सा शिक्षा, अस्पताल निर्माण और Ayushman Bharat जैसे योजनाओं में भारी निवेश किया है। 2022‑23 में चिकित्सा कॉलेजों की संख्या 818 तक पहुँच गई, और 1,28,875 नए स्नातक सीटें खोली गईं। फिर भी, ग्रामीण क्षेत्र में विशेषज्ञों की कमी 70‑80% तक है और 17,788 सब‑सेंटर बिना भवन के हैं।

सार्वजनिक बनाम निजी लागत तुलना

सेवासार्वजनिक अस्पताल (₹)निजी अस्पताल (₹)
औसत अस्पताल खर्च6,63150,508
आउट‑ऑफ‑पॉकेट हिस्सा43.4%56.6%

क्यों यह महत्वपूर्ण है

BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, भारत का स्वास्थ्य ढाँचा अभी भी सार्वजनिक-निजी संतुलन में असंतुलित है। यदि रोगी को 5 लाख रुपये का इलाज मिलता है, तो बीमा भुगतान से वह तुरंत वित्तीय विनाश से बच सकता है, परंतु कुल लागत अभी भी 5 लाख रुपये ही होती है। यह एक ऐसी स्थिति पैदा करता है जहाँ सरकार, बीमाकर्ता, नियोक्ता या रोगी अंततः भुगतान करते हैं।

"सार्वजनिक स्वास्थ्य का वास्तविक उद्देश्य वह है जहाँ रोगी का जीवन और आर्थिक सुरक्षा एक साथ सुरक्षित हो," कहते हैं डॉ. आर. पाटिल, स्वास्थ्य नीति विश्लेषक।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

  • Ayushman Bharat कवरेज कैसे काम करता है और इसकी सीमाएँ क्या हैं?
  • निजी अस्पतालों की लागत बढ़ने से क्या रोगी पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा?
क्या आप जानते हैं? भारत की स्वास्थ्य प्रणाली में सार्वजनिक अस्पतालों का औसत रोगी प्रतिक्षा समय 7 दिन से अधिक है, जबकि निजी अस्पतालों में यह 2 दिन से कम है।

संपादक टिप्पणी

सिर्फ डॉक्टरों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है; हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि वे जहाँ जरूरत हो, पहुँचें और उनके काम का वास्तविक मूल्य सस्ती कीमत पर हो। यह लेख हमें याद दिलाता है कि स्वास्थ्य का वास्तविक माप सार्वजनिक व्यय के प्रतिशत में नहीं, बल्कि रोगी के लिए उपलब्ध, सस्ती और विश्वसनीय सेवाओं की गिनती में है।