मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने कहा कि भारत के ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCC) उच्च-स्तरीय कार्यों में संलग्न हैं, जिससे AI का जोखिम कम है, लेकिन प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है।
भारत के ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCC) अब केवल कम लागत वाले बैक-ऑफिस सपोर्ट तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे दुनिया के सबसे उन्नत तकनीकी कार्यों के केंद्र बन चुके हैं। मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) वी. अनंत नागेश्वरन ने हाल ही में सीआईआई (CII) जीसीसी बिजनेस समिट के दौरान यह महत्वपूर्ण विचार व्यक्त किए। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत के ये केंद्र अब नवाचार (Innovation) और बौद्धिक संपदा (Intellectual Property) के निर्माण में अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं।
उच्च-स्तरीय कार्यों का बढ़ता प्रभुत्व
नागेश्वरन ने रेखांकित किया कि भारत के विभिन्न शहरों जैसे मुंबई, बेंगलुरु, चेन्नई और पुणे में वैश्विक कंपनियां अपने सबसे महत्वपूर्ण कार्यों को संचालित कर रही हैं। वैश्विक बैंकों के जोखिम प्रबंधन प्रणाली से लेकर ऑटोमोबाइल कंपनियों के एम्बेडेड सिस्टम डिजाइन करने तक, और सेमीकंडक्टर चिप डिजाइन से लेकर फार्मास्युटिकल क्लिनिकल एनालिटिक्स तक—सब कुछ भारत से नियंत्रित हो रहा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत अब केवल कार्य निष्पादन (Execution) का केंद्र नहीं, बल्कि वैश्विक उत्पादों का निर्माण और पेटेंट फाइलिंग करने वाला एक प्रमुख केंद्र बन गया है।
AI की चुनौती और वास्तविकता
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते प्रभाव पर चर्चा करते हुए, CEA ने स्वीकार किया कि जो कार्य दोहराव वाले (Repetitive) और नियम-आधारित हैं, उन्हें AI बहुत आसानी से और सस्ते में बदल सकता है। यदि कोई केंद्र केवल कम लागत पर सरल कार्य करने के आधार पर टिका है, तो उसे वास्तविक खतरा है। हालांकि, उन्होंने तर्क दिया कि AI स्वयं को डिजाइन, तैनात या नियंत्रित नहीं कर सकता। इन प्रणालियों को प्रशिक्षित करने, परीक्षण करने और उनकी जवाबदेही तय करने के लिए उच्च कौशल वाले मानव मस्तिष्क की आवश्यकता होती है, और भारत इसी क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है।
प्रतिस्पर्धा और कौशल विकास की आवश्यकता
नागेश्वरन ने चेतावनी दी कि भारत को 'आत्मसंतुष्ट' (Complacent) होने की अनुमति नहीं देनी चाहिए। अन्य देश भारत के इस सफल मॉडल की नकल कर रहे हैं और भारत की लागत बढ़ रही है। उन्होंने शिक्षा और उद्योग के बीच की खाई को पाटने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि भारत हर साल बड़ी संख्या में स्नातक तो पैदा करता है, लेकिन उनमें से आधे से भी कम 'जॉब-रेडी' होते हैं। इस अंतर को पाटने के लिए विश्वविद्यालयों, उद्योगों और सरकार को एक साथ मिलकर काम करने की आवश्यकता है ताकि भारत की वैश्विक स्थिति को बरकरार रखा जा सके।