भारत ने अमेरिकी ट्रेड विभाग द्वारा फोर्स्ड लेबर के आधार पर प्रस्तावित 12.5% टैरिफ की वैधता पर सवाल उठाते हुए आधिकारिक पुनरावलोकन की मांग की है। व्यापार मंत्रालय ने बताया कि जांच में डेटा की असंगतियों और प्रमाणों की कमी है, जिससे द्विपक्षीय व्यापार संबंधों में तनाव बढ़ सकता है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- भारत ने यू.एस. के 12.5% टैरिफ की समीक्षा का अनुरोध किया।
- अमेरिकी सेक्शन 301 जांच में डेटा के असंगतियों और प्रमाण की कमी पर भारत ने सवाल उठाए।
- भारतीय उद्योग और एपीडिया ने टैरिफ के आर्थिक प्रभाव और अनावश्यकता को उजागर किया।
नई दिल्ली, 12 जुलाई 2026 – भारत ने अमेरिकी ट्रेड प्रतिनिधि (USTR) द्वारा फोर्स्ड लेबर के आधार पर प्रस्तावित 12.5% टैरिफ की वैधता पर आधिकारिक पुनरावलोकन की माँग की है। यह कदम उस समय आया है जब नई टैरिफ़ें 24 जुलाई से लागू होने की नियत तिथि के निकट हैं, जिससे दोनों देशों के बीच व्यापारिक तनाव बढ़ रहा है।
पृष्ठभूमि और कानूनी ढांचा
अमेरिका का सेक्शन 301, 1994 के ट्रेड एक्ट का एक प्रमुख प्रावधान है, जो अनुचित व्यापार प्रथाओं के खिलाफ उपाय करने की अनुमति देता है। फोर्स्ड लेबर को एक गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन माना जाता है, और इससे जुड़े टैरिफ़ें अक्सर अंतरराष्ट्रीय दबाव का साधन बनते हैं। हालांकि, भारत ने तर्क दिया है कि USTR ने इस जांच में व्यापक, लेकिन अस्पष्ट डेटा का प्रयोग किया है, और किसी भी विशिष्ट उद्योग या देश‑विशिष्ट प्रमाण के बिना 46 अर्थव्यवस्थाओं को एक ही वर्ग में समूहित किया है।
भारत का औपचारिक जवाब
वाणिज्य विभाग के संयुक्त सचिव बृज मोहन मिश्रा ने सार्वजनिक सुनवाई में कहा कि फोर्स्ड लेबर की समाप्ति भारत के संविधानिक दायित्व और अंतरराष्ट्रीय कानून की मूलभूत आवश्यकता है। लेकिन उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि USTR की रिपोर्ट में “फोर्स्ड लेबर आयात प्रतिबंध की अनुपस्थिति” को पर्याप्त प्रमाण के बिना “अनुचित” नहीं माना जा सकता। मिश्रा ने कहा कि वर्तमान टैरिफ़ का आधार असंगतियों से भरा है और इसे द्विपक्षीय व्यापार वार्ता के दायरे में ही सुलझाया जाना चाहिए।
उद्योग की चिंताएँ
रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (RIL) के अध्यक्ष अनिल राजवांशी ने बताया कि कंपनी के पेट्रोकेमिकल उत्पाद कम‑जोखिम स्रोतों से आते हैं, और फोर्स्ड लेबर से जुड़ी कोई भी आपूर्ति शृंखला नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि पहले से ही भारतीय पीएसएफ और PET रेजिन पर 10‑15% टैरिफ़ लगाए जा रहे हैं; अतिरिक्त 12.5% टैरिफ़ कुल मिलाकर 30‑40% तक पहुंच सकता है, जिससे अमेरिकी downstream उपयोगकर्ताओं के लिए लागत में भारी वृद्धि होगी।
कृषि निर्यात पर असर
अग्रिम एग्रीकल्चर एंड प्रोसेस्ड फ़ूड प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट डिवेलपमेंट अथॉरिटी (APEDA) के प्रतिनिधि श्रेयान्स गुप्ता ने राइस आयात के संबंध में कहा कि भारत में आयातित चावल का कुल मूल्य निर्यातित चावल के 3% से भी कम है, और फोर्स्ड लेबर के संदिग्ध चावल पर सख्त नियामक जांच मौजूद है। उन्होंने कहा कि वर्तमान जांच को बिना पूर्वाग्रह के रद्द किया जाना चाहिए, और यदि टैरिफ़ लागू रहता है तो भारतीय चावल को विशेष छूट दी जानी चाहिए।
समग्र रूप से, भारत का यह कदम न केवल टैरिफ़ के आर्थिक प्रभाव को लेकर बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रणाली में पारदर्शिता और न्यायसंगतता की मांग को भी रेखांकित करता है। इस विवाद का निपटारा द्विपक्षीय वार्ता के माध्यम से होना ही संभव है, अन्यथा दोनों देशों के व्यापारिक रिश्ते को दीर्घकालिक नुकसान हो सकता है।