सरकारी वित्तीय सहायता ने मेरठ के छोटे उद्यमियों को बड़े व्यापारियों में बदल दिया है। राजकुमार ठाकुर की मोमोज़ फैक्ट्री और ममता गर्ग की हस्तशिल्प इकाई इस परिवर्तन के प्रमुख उदाहरण हैं।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • मुख्य मंत्री स्टार्टअप योजना ने छोटे उद्यमियों को 5‑10 लाख की ऋण सुविधा प्रदान की।
  • स्टैंड‑अप इंडिया जैसी केंद्र‑स्तरीय योजनाओं ने महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने में मदद की।
  • इन पहलों से मेरठ में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।

मेरठ, जो कभी मुख्यतः कृषि और पारंपरिक उद्योगों के लिए जाना जाता था, अब राष्ट्रीय स्तर पर एक उभरते हुए स्टार्टअप हब के रूप में पहचान बना रहा है। इस परिवर्तन की रीढ़ में उत्तर प्रदेश सरकार की मुख्य मंत्री स्टार्टअप योजना और केंद्र सरकार के स्टैंड‑अप इंडिया कार्यक्रम का सक्रिय सहयोग है। ये योजनाएँ न केवल पूँजी की कमी को दूर करती हैं, बल्कि उद्यमियों को प्रौद्योगिकी, प्रशिक्षण और बाजार‑सम्मुखता के पहलुओं में भी मार्गदर्शन प्रदान करती हैं।

राजकुमार ठाकुर की मोमोज़ कहानी

कुछ साल पहले, निजी क्षेत्र में नौकरी करते हुए राजकुमार ठाकुर ने केवल ₹10,000 की शुरुआती पूँजी से मोमोज़ का स्टॉल खोला। हाथ‑से‑बनाए मोमोज़ की गुणवत्ता ने जल्दी ही स्थानीय ग्राहकों का ध्यान आकर्षित किया, लेकिन बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए पारंपरिक उत्पादन पद्धति अपर्याप्त रही। तब उन्होंने मुख्य मंत्री स्टार्टअप योजना के तहत ₹5 लाख का ऋण प्राप्त किया, जिससे एक आधुनिक उत्पादन मशीन आयात की जा सकी। आज उनकी फैक्ट्री रोज़ाना 6,000‑7,000 मोमोज़ तैयार करती है, 29 विविधताओं के साथ 30‑35 आउटलेट्स में वितरित होती है। इस उद्यम ने सीधे 11 व्यक्तियों (8 महिलाएँ, 3 पुरुष) को रोजगार दिया है, जबकि लगभग 50 लोग अप्रत्यक्ष रूप से लाभान्वित हो रहे हैं।

ममता गर्ग का हस्तशिल्प उद्यम

मेरेटर में रहने वाली ममता गर्ग ने 15‑16 साल पहले अपने गाँव की महिलाओं को हस्तशिल्प प्रशिक्षण देना शुरू किया। समय के साथ मांग में वृद्धि हुई और उन्हें उत्पादन बढ़ाने के लिए पूँजी की आवश्यकता महसूस हुई। स्टैंड‑अप इंडिया योजना के तहत उन्होंने ₹10 लाख का ऋण और ₹1 लाख का कार्यशील पूँजी समर्थन प्राप्त किया। इस वित्तीय सहायता से उन्होंने कच्चे माल की खरीद, उपकरण और डिजिटल मार्केटिंग में निवेश किया। आज उनका व्यवसाय 25 महिलाओं को सीधे और कई घरों को अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार प्रदान करता है, और वार्षिक टर्नओवर लगभग ₹32 लाख तक पहुँच गया है। उनकी योजना दिल्ली में नई शाखा खोलने की भी है।

स्थानीय अर्थव्यवस्था पर व्यापक प्रभाव

इन दो सफलताओं ने यह सिद्ध किया है कि समय पर वित्तीय सहायता छोटे व्यापारियों को उत्पादन क्षमताओं का विस्तार करने, विविधता लाने और बड़े बाजारों तक पहुंच बनाने में सक्षम बनाती है। रोजगार सृजन के साथ-साथ महिलाओं की आर्थिक सशक्तिकरण भी इन योजनाओं का एक प्रमुख परिणाम है। मेरठ में अब कई युवा और महिला उद्यमी सरकारी स्कीमों के माध्यम से समान अवसर की आशा ले कर आगे बढ़ रहे हैं।

भविष्य की दिशा

यदि इन पहलों को निरंतर समर्थन और बेहतर अनुगमन मिलता रहा, तो मेरठ न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी एक मॉडल उद्यमशीलता शहर बन सकता है। नीति निर्माताओं को चाहिए कि वे ऋण प्रक्रिया को सरल बनाते हुए, तकनीकी प्रशिक्षण और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म तक पहुंच को और विस्तृत करें, ताकि अधिक से अधिक छोटे उद्यमी इस परिवर्तन की लहर में शामिल हो सकें।