ब्राउन विश्वविद्यालय में जनरेटिव AI के उपयोग से बड़े पैमाने पर परीक्षा धोखा करने की खबर ने शिक्षा जगत में तीखा बहस छिड़ा दी है। प्रोफ़ेसर रॉबर्टो सेर्रानो के आरोपों से पता चलता है कि प्रतिस्पर्धी आईवी लीग छात्र शॉर्टकट की ओर क्यों आकर्षित हो रहे हैं।

आईवी लीग के कॉलेजों में प्रवेश पाने वाले छात्र आम तौर पर उच्च बौद्धिक क्षमता, प्रतिस्पर्धी भावना और भारी शेड्यूल से परिचित होते हैं। ये विशेषताएँ उन्हें शैक्षणिक सफलता के रास्ते पर ले जाती हैं, परन्तु साथ ही तनाव और समय की कमी भी उत्पन्न करती हैं। ऐसे माहौल में जनरेटिव AI को एक आसान शॉर्टकट के रूप में देखा जाता है, जहाँ छात्र परीक्षा और असाइनमेंट में मदद पाने के लिए चैटबॉट्स का सहारा लेते हैं।

ब्राउन में खुलासा: बड़े पैमाने पर AI‑धोखा

ब्राउन विश्वविद्यालय में हाल ही में एक आर्थिक वर्ग में बड़े पैमाने पर AI‑धोखा होने का आरोप सामने आया। इस वर्ग के प्रोफ़ेसर रोबर्टो सेर्रानो ने कहा कि उन्होंने कई छात्रों को AI‑जनित उत्तर जमा करते हुए पाया। उनका कहना है कि यह केवल एक बार की घटना नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित प्रवृत्ति है, जो छात्रों के वास्तविक सीखने को कमजोर कर रही है।

प्रींटन के आंकड़े से तुलना

एक हालिया सर्वेक्षण में प्रींटन विश्वविद्यालय के 29.9% छात्रों ने स्वीकार किया कि उन्होंने कम से कम एक परीक्षा या असाइनमेंट में AI का उपयोग किया। यह आंकड़ा पहले ही यह दर्शाता है कि AI‑धोखा एक व्यक्तिगत त्रुटि नहीं, बल्कि एक व्यापक समस्या बन चुका है। ब्राउन में इस प्रवृत्ति का विस्तार देखकर यह स्पष्ट हो जाता है कि ऐसी धोखाधड़ी केवल कुछ छात्रों तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे शैक्षणिक माहौल को प्रभावित कर रही है।

साइको‑सामाजिक कारण

छात्रों की प्रतिस्पर्धी भावना, उच्च अकादमिक मानक, और भविष्य के करियर की चिंता अक्सर उन्हें तेज़ी से परिणाम पाने के लिए AI का सहारा लेने के लिए प्रेरित करती है। जब समय सीमा निकट आती है, तो AI‑टूल्स को “सुरक्षित” विकल्प मान लिया जाता है, जबकि वास्तविक समझ और विश्लेषण को पीछे छोड़ दिया जाता है। यह न केवल शैक्षणिक ईमानदारी को चोट पहुँचाता है, बल्कि दीर्घकालिक रूप से समाज के बौद्धिक विकास को भी कमजोर करता है।

भविष्य के लिए संभावित कदम

शिक्षा संस्थानों को अब AI‑धोखे को रोकने के लिए कड़े तकनीकी और नीतिगत उपाय अपनाने की आवश्यकता है। इसमें एंटी‑प्लैजेरिज्म सॉफ़्टवेयर की विस्तृत जांच, प्रोफ़ेसरों को AI‑डिटेक्शन के प्रशिक्षण, और छात्रों के बीच नैतिकता एवं जिम्मेदारी की जागरूकता बढ़ाना शामिल हो सकता है। साथ ही, विश्वविद्यालयों को छात्रों को समय प्रबंधन और वास्तविक सीखने के मूल्य को समझाने के लिए काउंसिलिंग सेवाएँ भी प्रदान करनी चाहिए।

जब तक इस समस्या को व्यापक रूप से नहीं पहचाना और संबोधित किया गया, AI‑धोखा न केवल व्यक्तिगत करियर को, बल्कि पूरे शैक्षणिक संस्थान की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा सकता है। इस मुद्दे पर खुली चर्चा और त्वरित कार्रवाई ही इस “विफल समाज” को रोकने की कुंजी हो सकती है।