एक आईआईटी प्रोफेसर ने भारतीय शिक्षा प्रणाली की आलोचना करते हुए कहा है कि भारत गलत प्रकार की बुद्धिमत्ता का पीछा कर रहा है, जिससे खेल और कला जैसी प्रतिभाएं अनदेखी रह जाती हैं।

भारतीय शिक्षा प्रणाली दशकों से केवल शैक्षणिक उत्कृष्टता और रटने की क्षमता को ही 'बुद्धिमत्ता' का पैमाना मानती आई है। इसी कड़ी में, एक आईआईटी (IIT) प्रोफेसर ने एक गंभीर सवाल उठाया है कि क्या हमारे स्कूल कभी लियोनेल मेसी जैसे वैश्विक आइकन की पहचान कर पाएंगे? प्रोफेसर का तर्क है कि भारत वर्तमान में 'गलत बुद्धिमत्ता' (Wrong Intelligence) के पीछे भाग रहा है, जहाँ केवल गणितीय और भाषाई कौशल को प्राथमिकता दी जाती है।

शारीरिक-गतिज बुद्धिमत्ता की अनदेखी

मनोवैज्ञानिकों और शिक्षाविदों के अनुसार, बुद्धिमत्ता के कई प्रकार होते हैं। इनमें से एक है 'बॉडी-काइनेस्टेटिक इंटेलिजेंस' (Bodily-Kinesthetic Intelligence), जो शरीर के अंगों पर सटीक नियंत्रण और शारीरिक समन्वय की क्षमता है। लियोनेल मेसी जैसे खिलाड़ी इसी बुद्धिमत्ता के शिखर पर होते हैं। हालांकि, भारतीय स्कूलों में खेल को अक्सर एक 'अतिरिक्त गतिविधि' (Extra-curricular activity) माना जाता है, न कि बुद्धिमत्ता का एक रूप।

सिस्टम की खामियां और सामाजिक दबाव

भारत में माता-पिता और समाज का दबाव बच्चों को केवल इंजीनियरिंग या मेडिकल जैसे क्षेत्रों की ओर धकेलता है। इस प्रक्रिया में, वे बच्चे जो शारीरिक रूप से प्रतिभाशाली होते हैं या जिनमें रचनात्मक सोच होती है, उन्हें 'औसत' मान लिया जाता है। प्रोफेसर के अनुसार, जब तक हम यह नहीं समझेंगे कि एक फुटबॉल खिलाड़ी की रणनीति बनाने की क्षमता एक गणितज्ञ के समीकरण हल करने की क्षमता के समान ही जटिल और बौद्धिक है, तब तक हम वैश्विक खेल पटल पर अपनी छाप नहीं छोड़ पाएंगे।

भविष्य की राह: समग्र विकास

नई शिक्षा नीति (NEP) में कुछ बदलावों की बात की गई है, लेकिन जमीनी स्तर पर बदलाव अभी भी धीमा है। विशेषज्ञों का मानना है कि स्कूलों को अपनी मूल्यांकन पद्धति बदलनी चाहिए। बुद्धिमत्ता का आकलन केवल लिखित परीक्षाओं से नहीं, बल्कि शारीरिक कौशल, कलात्मक अभिव्यक्ति और समस्या समाधान की क्षमता के आधार पर होना चाहिए। यदि भारत अपनी इस 'बौद्धिक संकीर्णता' को छोड़ देता है, तो वह निश्चित रूप से दुनिया को अगले मेसी या महान कलाकार दे सकता है।