सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि POcSO अधिनियम के तहत किसी भी व्यक्ति को, जो बच्चे के यौन उत्पीड़न की जानकारी रखता है लेकिन पुलिस को नहीं बताता, दंडित किया जा सकता है। इस फैसले में स्कूल की प्रधानाध्यापिका को रिपोर्ट न करने के कारण अभियोजन की अनुमति दी गई।

नई दिल्ली: भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने 10 जुलाई को एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया, जिसमें कहा गया कि POcSO (Protection of Children from Sexual Offences) अधिनियम के तहत यदि कोई व्यक्ति यह जानता है कि बाल यौन अपराध हुआ है, लेकिन उसे पुलिस को नहीं बताता, तो वह भी अपराधी माना जाएगा और उसे दण्डित किया जा सकता है। यह निर्णय न्यायमूर्ति मनोज मिस्रा और के. वी. विश्वनाथन की बेंच द्वारा दिया गया, जिन्होंने "ज्ञान" शब्द की विस्तृत व्याख्या की।

क़ानून की शब्दावली पर नई दृष्टि

बेंच ने कहा कि POcSO अधिनियम में "knowledge" शब्द को केवल प्रत्यक्ष दृष्टि तक सीमित नहीं किया जा सकता; यह उस जानकारी को भी सम्मिलित करता है जो पीड़ित से सीधे प्राप्त हुई हो। अधिनियम की धारा 19 और धारा 21 का संयुक्त अध्ययन यह दर्शाता है कि किसी भी व्यक्ति को, जो इस अपराध के होने की जानकारी रखता है, विशेष ज्यूवेनाइल पुलिस इकाई या स्थानीय पुलिस को सूचित करना अनिवार्य है। यदि वह सूचना नहीं देता, तो वह धारा 21 के तहत दण्डनीय है।

मामले की पृष्ठभूमि

इस मामले में एक छात्रा ने अपनी स्कूल प्रिंसिपल (हेडमिस्ट्रेस) को बताया कि उसे बलात्कार किया गया था। हेडमिस्ट्रेस ने निजी भागों की जांच की, लेकिन शिकायत को खारिज कर दिया। कुछ महीने बाद, बच्चे के माता‑पिता को यह बात पता चली और FIR दर्ज करवाई गई। चूंकि जानकारी चार व्यक्तियों तक पहुंची थी – दो बहनें, एक मित्र, स्कूल की हेड गर्ल और प्रधानाध्यापिका – और उनमें से तीन नाबालिग थे, इसलिए केवल प्रधानाध्यापिका पर ही अभियोजन की अनुमति दी गई।

सामाजिक और कानूनी प्रभाव

इस निर्णय से यह स्पष्ट हो गया कि बाल यौन अपराध के मामलों में मौन रहना अब कानूनी रूप से अस्वीकार्य है। स्कूल, कॉलेज और अन्य शैक्षणिक संस्थानों के प्रबंधकों को यह समझना होगा कि उनका दायित्व केवल शैक्षणिक नहीं, बल्कि सुरक्षा भी है। इस दिशा‑निर्देश के कारण भविष्य में अधिक संस्थाओं को बाल संरक्षण के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाने के लिए प्रेरित किया जा सकता है।

भविष्य की राह

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के फैसले से न केवल अपराधियों को दण्डित किया जाएगा, बल्कि पीड़ितों को समय पर सहायता भी मिल सकेगी। सरकार को चाहिए कि वह इस निर्णय को लागू करने के लिए जागरूकता अभियानों और प्रशिक्षण कार्यक्रमों को तेज़ी से शुरू करे, ताकि किसी भी स्कूल में ऐसी घटनाएँ न दोहराई जाएँ।