कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने वीबीएसए (विकसित भारत शिक्षा संस्थान) बिल को अत्यधिक केन्द्रियकरण वाला और विश्वविद्यालय स्वायत्तता को कमजोर करने वाला कहा, और अंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री से कहा कि यदि बिल राज्य के हितों को नुकसान पहुंचाता है तो साहसिक कदम उठाएँ।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • VBSA बिल के विरोध में कांग्रेस का आह्वान
  • बिल में केन्द्रियकरण के कारण राज्य अधिकारों की हानि
  • विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता और अनुदान वितरण पर प्रभाव

कांग्रेस महासचिव (संचार) जयराम रमेश ने 10 जुलाई, 2026 को मोनसून सत्र के दौरान पेश होने वाले विकसित भारत शिक्षा संस्थान 2025 बिल (VBSA बिल) के खिलाफ NDA‑शासित राज्यों, विशेषकर अंध्र प्रदेश को दृढ़ विरोध करने का आग्रह किया। उन्होंने सामाजिक मीडिया प्लेटफ़ॉर्म X पर यह स्पष्ट किया कि यदि यह विधेयक राज्य की शक्ति को घटाता है तो राज्य सरकारों को “साहसिक रूप से खड़े होकर गिनना” चाहिए।

बिल में केन्द्रियकरण की मुख्य धारा

रमेश का तर्क है कि बिल संसद के संघ सूची के अनुच्छेद 66 की सीमा से परे जाकर शिक्षा के मानक निर्धारण से आगे राज्य के अधिकारों में हस्तक्षेप करता है। इस विधेयक में विश्वविद्यालयों की स्थापना, नियमन और विघटन से संबंधित कई प्रावधान राज्य सरकारों को हटाकर केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय को सौंपे गए हैं, जिससे मौजूदा संघीय संरचना कमजोर हो सकती है।

अनुदान और नियामक संस्थाओं की भूमिका में बदलाव

उन्होंने नई संरचना में समर्पित ग्रांट्स काउंसिल की अनुपस्थिति को उजागर किया। 2020 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने उच्च शिक्षा परिषद (HEC) के तहत चार खंडों की योजना पेश की थी, जिनमें अनुदान वितरण भी शामिल था। लेकिन VBSA बिल केवल तीन परिषदों का प्रावधान करता है, जिससे विश्वविद्यालय ग्रांट्स आयोग (UGC) और ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन (AICTE) जैसी संस्थाओं की मौजूदा वित्तीय शक्ति केंद्र के हाथों में चली जाएगी।

प्रमुख संस्थानों की स्वायत्तता पर प्रभाव

बिल में राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों – IIT, IIM, NIT, IIIT और IISER – पर भी ओवरराइडिंग प्रभाव डालने की धारा शामिल है। ये संस्थान वर्तमान में वैधानिक ढाँचे के तहत काफी स्वायत्तता का आनंद लेते हैं। यदि नया आयोग इन संस्थानों पर नियामक नियंत्रण स्थापित करता है, तो शैक्षिक नवाचार और विश्व स्तर की प्रतिस्पर्धा पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।

परामर्शीय तंत्र का क्षीणन

वर्तमान UGC अधिनियम में विश्वविद्यालयों से परामर्श करने की अनिवार्य प्रक्रिया है। लेकिन प्रस्तावित VBSA बिल नई परिषदों को मानक निर्धारण और निरीक्षण के व्यापक अधिकार देता है, बिना समान कानूनी परामर्श की आवश्यकता के। इससे संस्थानों की आवाज़ कम हो जाएगी और शैक्षिक नीति निर्माण में एकतरफ़ा केंद्रीय दृष्टिकोण को बल मिलेगा।

कांग्रेस ने इस बात पर बल दिया कि शिक्षा का भविष्य लोकतांत्रिक साझेदारी में निहित है, जहाँ केंद्र और राज्य दोनों की भूमिका स्पष्ट रूप से परिभाषित हो। उनके अनुसार, यदि राज्य सरकारें इस विधेयक को बिना विरोध के स्वीकार कर लेती हैं, तो यह भारतीय संघीयता के मूल सिद्धांतों को कमजोर कर देगा।