दिल्ली विश्वविद्यालय ने भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) के साथ एक समझौता पत्र पर हस्ताक्षर किए, जिससे कैंपस में साइबर सुरक्षा, जागरूकता और महिला छात्रों की सुरक्षा को सुदृढ़ किया जाएगा। यह पहल डिजिटल बुलिंग और धोखाधड़ी के जोखिमों को कम करने के लिए शैक्षणिक सहयोग, कार्यशालाएँ और इंटर्नशिप को शामिल करेगी।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- DU‑I4C समझौते से कैंपस में साइबर जागरूकता बढ़ेगी
- महिला छात्रों, विशेषकर कमजोर वर्गों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाएगी
- शिक्षा, कार्यशालाएँ, हैकाथॉन और इंटर्नशिप के माध्यम से व्यावहारिक कौशल विकसित होंगे
नई दिल्ली – दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) ने सोमवार को भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C), जो गृह मंत्रालय के अधीन कार्य करता है, के साथ एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए। यह सहयोग कैंपस में साइबर धोखाधड़ी, डिजिटल बुलिंग और ऑनलाइन उत्पीड़न के खिलाफ एक व्यापक सुरक्षा ढांचा तैयार करने के उद्देश्य से किया गया है।
पृष्ठभूमि और आवश्यकता
पिछले कुछ वर्षों में भारत में डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर साइबर अपराध में तेज़ी से वृद्धि देखी गई है, जिसमें विशेष रूप से आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों की महिला छात्राएँ प्रमुख लक्ष्य बन गई हैं। पीड़ितों की संख्या में निरंतर बढ़ोतरी ने शैक्षणिक संस्थानों को सक्रिय कदम उठाने के लिए प्रेरित किया है। विश्वविद्यालय रजिस्ट्रार विकास गुप्ता ने कहा, “हमने कई ऐसे मामले देखे हैं जहाँ छोटी‑सी लापरवाही से छात्राओं को गंभीर नुकसान पहुँचा है। इस MoU का उद्देश्य इन जोखिमों को न्यूनतम करना है।”
I4C की भूमिका और साझेदारी के लक्ष्य
I4C के निदेशक निशांत कुमार ने बताया कि यह साझेदारी एक “साइबर‑सजग शैक्षणिक पारिस्थितिकी तंत्र” बनाने की दिशा में कई संयुक्त पहलें लाएगी। इस योजना में जागरूकता कार्यक्रम, कार्यशालाएँ, सेमिनार, हैकाथॉन, छात्र प्रतियोगिताएँ, इंटर्नशिप और साइबर वॉलंटियर प्रोफ़ाइल शामिल हैं। साथ ही, विश्वविद्यालय द्वारा मान्यता प्राप्त यूजीसी (UGC) साइबर सुरक्षा पाठ्यक्रमों को भी प्रोमोट किया जाएगा।
अंतःविषय सहयोग और व्यावहारिक सीख
डेलि विश्वविद्यालय के कंप्यूटर सेंटर के निदेशक संजीव सिंह ने कहा कि इस समझौते से छात्रों को “अनुभव‑आधारित सीखने” के अवसर मिलेंगे, जिसमें साइबर‑वॉलंटियर प्रोग्राम और वास्तविक‑विश्व परियोजनाएँ शामिल होंगी। इससे न केवल छात्रों की तकनीकी दक्षता बढ़ेगी, बल्कि उन्हें भविष्य में साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ बनने के लिए आवश्यक बुनियादी ज्ञान भी मिलेगा।
भविष्य की संभावनाएँ
सहयोग के तहत नियमित रूप से नीति‑निर्माताओं, उद्योग विशेषज्ञों और अकादमिक विद्वानों के बीच ज्ञान‑साझा करने के मंच स्थापित किए जाएंगे। इससे न केवल DU के छात्रों को लाभ होगा, बल्कि देश भर के शैक्षणिक संस्थानों में साइबर सुरक्षा शिक्षा को एक मानक के रूप में स्थापित करने में भी मदद मिलेगी। इस पहल को राष्ट्रीय स्तर पर एक मॉडल के रूप में देखा जा रहा है, जिससे अन्य विश्वविद्यालयों को भी समान सहयोग अपनाने की प्रेरणा मिल सकती है।