पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में दलीलजीत दोसांझ की बायोपिक 'सतलुज' को हटाने के खिलाफ सार्वजनिक हित याचिका दायर की गई है। याचिका के अनुसार, बिना किसी न्यायिक आदेश के फिल्म का हटना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सूचना के अधिकार का उल्लंघन है।

जुलाई 9, 2026 को पंजाब‑हरियाणा हाईकोर्ट में एक सार्वजनिक हित याचिका (PIL) दायर की गई, जिसमें दलीजित दोसांझ‑मुख्य भूमिका वाली फिल्म सतलुज की पुनर्स्थापना की माँग की गई। यह फ़िल्म, जो ज़ी5 (ZEE5) पर डिजिटल रिलीज़ के कुछ ही दिनों बाद हटाई गई, पंजाब के उग्रवादी दौर में मानवाधिकार कार्यकर्ता जासवंत सिंह खलरा की सच्ची कहानी पर आधारित है।

पृष्ठभूमि और ऐतिहासिक महत्व

जासवंत सिंह खलरा 1990‑1995 के बीच कई गायब हुए सिख युवाओं के परिवारों को न्याय दिलाने के लिए अपने दस्तावेज़ी अनुसंधान के लिए जाने जाते थे। उनका काम 1995 में उनके अपहरण और गुप्त हत्या तक पहुँच गया, जो आज भी भारतीय न्यायिक इतिहास में एक संवेदनशील मुद्दा है। फिल्म 'सतलुज' इन घटनाओं को सिनेमाई रूप में प्रस्तुत करने का साहसिक प्रयास है, जिससे नई पीढ़ी को इस अतीत की सच्चाई से रूबरू कराया जा सके।

न्यायिक और संवैधानिक पहलू

याचिकाकर्ता शरवान सिंह ने केंद्र सरकार, सेंट्रल बोर्ड ऑफ फ़िल्म सर्टिफ़िकेशन (CBFC), पंजाब सरकार, ज़ी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइज़ेज़ लिमिटेड और ज़ी5 को प्रतिवादी घोषित किया है। याचिका में कहा गया है कि बिना किसी वैध आदेश के फ़िल्म को हटाना अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सूचना के अधिकार का गंभीर उल्लंघन है। साथ ही, यह कदम दर्शकों को उन फ़िल्मों से वंचित करता है, जिनके लिए उन्होंने पहले ही सदस्यता शुल्क चुका दिया है।

राजनीतिक प्रतिक्रिया और सामाजिक प्रभाव

शिरोमानि अकाली दल (SAD) ने 'सतलुज' को पूरे पंजाब में स्क्रीन करने की घोषणा की है। पार्टी के प्रमुख सुखबीर सिंह बडाल ने कहा कि यह कदम नई पीढ़ी को उस “अकथनीय त्रासदी” से अवगत कराएगा, जो उस समय की कांग्रेस सरकार ने जासवंत खलरा और हजारों निर्दोष सिख युवाओं के खिलाफ की थी। यह पहल फिल्म को हटाने के निर्णय को चुनौती देने और सामुदायिक जागरूकता को बढ़ावा देने के दोहरे उद्देश्यों को पूरा करती है।

भविष्य की संभावनाएँ

यदि हाईकोर्ट इस PIL को स्वीकार करता है, तो यह भारतीय सिनेमा में संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल स्थापित कर सकता है। साथ ही, यह OTT प्लेटफ़ॉर्मों को पारदर्शिता और न्यायिक प्रक्रिया के अनुपालन के लिए अधिक जिम्मेदार बना सकता है। इस मामले का विकास न केवल फ़िल्म उद्योग बल्कि मानवाधिकार व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के व्यापक विमर्श को भी प्रभावित करेगा।