अभिनेत्री सुधांशु पांडे ने सोशल मीडिया पर रियलिटी शोज़ में बढ़ती गाली‑गलौज की आलोचना की। उन्होंने कहा कि यदि यह प्रवृत्ति जारी रही तो समाज की बुनियाद कमजोर हो जाएगी और प्लेटफ़ॉर्म्स को इस प्रकार के कंटेंट को रोकना चाहिए।
टेलीविज़न और OTT प्लेटफ़ॉर्म पर रियलिटी शोज़ का दायरा लगातार बढ़ रहा है, लेकिन साथ ही उनमें अभद्र भाषा और आपसी अपशब्दों का प्रयोग भी बढ़ा है। इस संदर्भ में अभिनेता सुधांशु पांडे, जो अपनी भूमिका वंजर शाह के लिए जाने जाते हैं, ने हाल ही में अपने सोशल‑मीडिया अकाउंट पर एक वीडियो पोस्ट कर इस प्रवृत्ति की कड़ी निंदा की।
वीडियो में पांडे की मुख्य बातें
पांडे ने कहा कि वह सामाजिक बुनियाद के ‘पूरी तरह से बिखरने’ से डरते हैं, यदि ऐसे शो को दर्शकों द्वारा सराहा जाता रहा। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि न केवल नई पीढ़ी, बल्कि पिछले दो पीढ़ियों में भी इस बदलाव की लहर देखी जा रही है। उनका मानना है कि इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफ़ॉर्म पर इस तरह के कंटेंट को लाइक और शेयर करने की प्रवृत्ति, समाज की मानसिकता को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रही है।
लॉक अप 2 और सुनिता अहुजा का उल्लेख
हालांकि पांडे ने सीधे किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन उन्होंने ‘लॉक अप 2’ के एक एपीसोड का हवाला देते हुए कहा कि एक वरिष्ठ अभिनेता की पत्नी, जो स्वयं भी शो में भाग ले रही हैं, खुलकर गाली‑गलौज कर रही हैं। यह टिप्पणी सुनिता अहुजा को अप्रत्यक्ष रूप से संबोधित करती दिखी, जिससे सोशल मीडिया पर चर्चा तेज़ हो गई। पांडे ने सवाल किया, “हम किस प्रकार का उदाहरण दुनिया को दे रहे हैं? यदि हम वरिष्ठ हैं तो हमें युवा पीढ़ी के लिए सही मॉडल बनना चाहिए।”
रियलिटी शोज़ में गाली‑गलौज का इतिहास
‘बिग बॉस’ और ‘क्वीन के जवाब’ जैसे लोकप्रिय शो में भी पिछले कुछ वर्षों में अभद्र भाषा को लेकर कई बार विवाद उत्पन्न हुए हैं। भारतीय प्रेक्षक परिषद (BPC) और ब्रॉडकास्टिंग कंटेंट कमेटी (BCC) ने कई बार ऐसे कंटेंट को सीमित करने की सलाह दी है, लेकिन व्यावसायिक दबाव और दर्शक आँकड़े अक्सर इन्हें अनदेखा कर देते हैं। पांडे का यह बयान इस बड़े मुद्दे की ओर प्रकाश डालता है—वाणिज्यिक सफलता और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
शब्दों की शक्ति और जिम्मेदारी
पांडे ने शब्दों के प्रभाव पर भी जोर दिया: “दो शब्द किसी की ज़िन्दगी बदल सकते हैं। हमें सकारात्मक और ज़िम्मेदार भाषा अपनानी चाहिए।” उन्होंने OTT और टीवी चैनलों से अपील की कि वे ‘मनोरंजन’ के नाम पर अपमानजनक कंटेंट को नहीं बढ़ावा दें। यदि इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो शब्दों की बर्बादी से सामाजिक असहिष्णुता और हिंसा में वृद्धि हो सकती है।
भविष्य की दिशा
सुधांशु पांडे ने यह भी कहा कि यदि अभद्र भाषा को अपनी पहचान बनाने का साधन माना गया, तो ‘हम जैसे लोग’ इस दुनिया में कहीं नहीं रहेंगे। उनका संदेश केवल व्यक्तिगत असंतोष नहीं, बल्कि भारतीय मनोरंजन उद्योग में नैतिक पुनर्संरचना की आवश्यकता को उजागर करता है। दर्शकों की पसंद बदलने पर ही इस समस्या का स्थायी समाधान संभव हो पाएगा।