प्रसिद्ध प्लेबैक गायिका एस जानकी, जिन्हें दक्षिण भारत की नाईटिंगेल कहा जाता था, 88 साल की उम्र में मैसूर में उनका निधन हो गया। चार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और 33 राज्य फिल्म पुरस्कारों से सम्मानित यह संगीत शख्सियत भारतीय संगीत इतिहास में अमिट छाप छोड़ गई हैं।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • एस जानकी का 88 वर्ष में देहान्त
  • चार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और 33 राज्य पुरस्कार
  • पद्म भूषण को ठुकरा कर भारत रत्न की मांग

एस जानकी, जिन्हें अक्सर "दक्षिण भारत की नाईटिंगेल" कहा जाता है, का निधन 11 जुलाई 2026 को मैसूर में हुआ। 88 वर्ष की आयु में उनका इस संसार से जाना भारतीय संगीत जगत के लिए एक बड़ा झटका है, क्योंकि वह पाँच दशकों से अधिक समय तक भारतीय फिल्म संगीत की ध्वनि को आकार देती रही हैं।

परिवारिक पृष्ठभूमि और प्रारंभिक जीवन

जन्म 23 अप्रैल 1938 को पल्लापतला, गुंटुर में हुआ, जहाँ उनके पिता, चिकित्सक और शिक्षक सीस्तला श्रीराममूर्ति, ने उन्हें संगीत के मूलभूत सिद्धांत सिखाए। नौ साल की आयु में सिरसिल्ला में उनका पहला मंच प्रदर्शन हुआ, परन्तु औपचारिक शास्त्रीय संगीत प्रशिक्षण कभी नहीं मिला। बहुभाषी प्रतिभा ने उन्हें तमिल, कन्नड़, मलयालम और हिन्दी में गाने की सुविधा दी, जबकि उनका मातृभाषा तेलुगु था।

प्लेबैक करियर की चमक

1957 में तमिल फिल्म विधी के खेल से 19 वर्ष की आयु में प्लेबैक गायक के रूप में शुरुआत की, और उसी साल छह भाषाओं में गाने रिकॉर्ड किए। अगले छह दशकों में उन्होंने 30,000 से अधिक गाने गाए, चार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और 33 राज्य पुरस्कार अर्जित किए। 2016 में उन्होंने आधिकारिक तौर पर रिकॉर्डिंग और मंच प्रदर्शन से सेवानिवृत्ति ली, पर 2018 में तमिल फिल्म पन्नाड़ी में आवाज़ दी, जिससे उनका 60‑वर्षीय संगीत सफर समाप्त हुआ।

सामाजिक मान्यता और विवाद

2013 में उन्होंने भारत का तीसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान – पद्म भूषण – को ठुकरा दिया, यह तर्क देते हुए कि उनका योगदान भारत रत्न के योग्य है। यह कदम न केवल उनके आत्मविश्वास को दर्शाता है, बल्कि भारतीय कला एवं सांस्कृतिक सम्मान प्रणाली में दीर्घकालिक परिवर्तन की आवश्यकता को उजागर करता है।

विरासत और भविष्य

एस जानकी की आवाज़ न केवल फिल्म संगीत में बल्कि शास्त्रीय, भक्तिगीत और लोक संगीत में भी गूँजती रही। उनके गीत आज भी युवा और बुजुर्ग दोनों के बीच लोकप्रिय हैं, और कई युवा कलाकार उनके स्वर को अनुकरण करने का प्रयास करते हैं। उनका निधन भारतीय संगीत के विविधतापूर्ण इतिहास में एक अनमोल अध्याय को समाप्त करता है, लेकिन उनकी ध्वनि पीढ़ियों तक जीवित रहेगी।