श्री सुखबीर सिंह बडाल ने ज़ी5 से धीरजित डोसेंझ की फिल्म ‘सतलुज’ के हटाए जाने को ‘सामूहिक स्मृति, सत्य और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ पर हमला कहा। उन्होंने कहा, पंजाब को अपने दर्दनाक इतिहास का सामना ईमानदारी से करना चाहिए, न कि सेंसरशिप से।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- सतलुज फिल्म को ज़ी5 से हटाया गया, जिससे राजनीतिक और सांस्कृतिक बहस छिड़ी।
- श्री सुखबीर बडाल ने इसे सामूहिक स्मृति पर हमले के रूप में वर्णित किया।
- फिल्म पंजाब के 1990 के दशक के क़ानून‑बाहरी दफ़न मामलों को उजागर करती है।
श्री सुखबीर सिंह बडाल, शिरोमणि अकाली दल (एसएडी) के अध्यक्ष, ने 6 जुलाई, 2026 को ज़ी5 से धीरजित डोसेंझ की बहुप्रतीक्षित फ़िल्म सतलुज के हटाए जाने पर तीखा विरोध प्रकट किया। बडाल ने ट्विटर (X) पर कहा, “यह केवल सेंसरशिप नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक स्मृति, सत्य और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला है।”
फ़िल्म का पृष्ठभूमि और विवाद
हनी त्रेहान द्वारा निर्देशित इस फ़िल्म का मूल शीर्षक ‘Punjab 95’ था और यह सामाजिक कार्यकर्ता जेएसवंत सिंह खलरा के जीवन पर आधारित है, जिन्होंने 1990 के दशक में राज्य‑प्रायोजित अनैतिक दफ़न मामलों को उजागर करने के लिए अपना प्राण न्योछावर किया। फ़िल्म ने कई कटौती की माँगों और सेंट्रल बोर्ड ऑफ फ़िल्म सर्टिफ़िकेशन (CBFC) के साथ लंबी लड़ाई के बाद ही रिलीज़ की अनुमति प्राप्त की।
ज़ी5 की प्रतिक्रिया और हटाने का कारण
ज़ी5 ने 5 जुलाई को एक बयान जारी करते हुए कहा, “सतलुज को लेकर दर्शकों का प्रतिक्रिया अत्यंत सकारात्मक रही है। हम इस कहानी को आगे बढ़ाते रहेंगे।” फिर भी दो दिन बाद प्लेटफ़ॉर्म ने फ़िल्म को अस्थायी रूप से हटाने का निर्णय लिया, जिसका औपचारिक कारण सार्वजनिक नहीं किया गया। इस अचानक हटाने ने न केवल फ़िल्म निर्माताओं को, बल्कि पंजाब के कई सामाजिक समूहों को चौंका दिया।
सुखबीर बडाल की आलोचना और राजनीतिक प्रभाव
बडाल ने हटाने को “सामूहिक स्मृति पर हमला” कहा और कहा कि “पंजाब को अपने अतीत का सामना ईमानदारी से करना चाहिए, न कि दमन से।” उनका बयान न केवल फ़िल्म के समर्थकों में समर्थन उत्पन्न कर रहा है, बल्कि यह भारत में वर्तमान सेंसरशिप नीति और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर व्यापक चर्चा को भी जन्म दे रहा है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की कार्रवाई से फ़िल्म निर्माताओं के आत्म-सेंसरशिप की प्रवृत्ति बढ़ सकती है।
भविष्य की संभावनाएँ
ज़ी5 ने कहा है कि “सतलुज का संवाद अभी जारी है और हम जल्द ही इसे पुनः उपलब्ध कराने की कोशिश करेंगे।” वहीं, खलरा की पत्नी परमजित कौर ने अकाल तख्त से ‘पीपल्स कमिशन’ बनाने का आह्वान किया है, जिससे इस मुद्दे को और ऊँचा मंच मिला है। इस प्रकार, सतलुज के हटाए जाने की कहानी अब सिर्फ एक फ़िल्म नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र, इतिहास और सांस्कृतिक स्मृति के बीच के जटिल संबंधों का प्रतीक बन गई है।