दक्षिण भारत की नाइटिंगेल एस जानकी, जिन्होंने छह दशकों में 40,000 से अधिक गीत गाए, 11 जुलाई को मैसूर में 88 वर्ष की आयु में लीन्हा। उनके संगीत सफर, राष्ट्रीय पुरस्कारों और पद्म भूषण से इनकार की कहानी आज भी प्रेरणा देती है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- एस जानकी ने 40,000 से अधिक गीत गाए, कई भाषाओं में आवाज़ दी
- उन्होंने चार राष्ट्रीय पुरस्कार जीते, पर पद्म भूषण से इनकार किया
- उनका संगीत सफर 1950 के दशक से लेकर एआर रहमान तक फैला
विलक्षण आवाज़ और गहरी भावनात्मक अभिव्यक्ति के कारण एस जानकी को अक्सर “दक्षिण भारत की नाइटिंगेल” कहा जाता है। 11 जुलाई को मैसूर में 88 वर्ष की आयु में उनका देहांत हुआ, पर उनका संगीत आज भी भारतीय फिल्म संगीत का अभिन्न हिस्सा बना रहेगा।
संगीत यात्रा की शुरुआत
आंध्र प्रदेश के पल्लापटला गांव में जन्मी जानकी बचपन से ही लता मंगेशकर के गीतों की दीवानी थीं। पारिवारिक रेडियो पर सुनते हुए उन्होंने खुद को आवाज़ देने का अभ्यास किया, बिना किसी औपचारिक प्रशिक्षण के। यह ही उनका वह मंच था जहाँ उन्होंने अपने काकी, रंगमंच कलाकार, द्वारा आयोजित नाटकों में भाग लेकर अपनी प्रतिभा दिखायी। इस दौरान फिल्म निर्माता बी.आर. पंथुलु और संगीत निर्देशक टी.जी. लिंगप्पा ने उनकी सुरीली आवाज़ को पहचाना और उन्हें चेन्नई बुलाकर तमिल फिल्म विधि का खेल (1957) में पहला गीत रिकॉर्ड करने का अवसर दिया।
भाषाई विविधता और अनुकूलनशीलता
ज्यादातर तेलुगु बोलने वाली जानकी ने मलयालम, तमिल और कन्नड़ में भी अपार सटीक उच्चारण के साथ गाए। वह दैनिक जीवन में शब्दों के प्रयोग को समझती, उनके अर्थ को सीखती और गाने के अभिप्राय के साथ अपने स्वर को मिलातीं। इस प्रकार उन्होंने संगीतकार एम.एस. विश्वनाथन, के.वी. महादेवन, इलाईरायाज, बप्पी लाहिरी और ए.आर. रहमान जैसे हर पीढ़ी के महान संगीतकारों के साथ सहजता से काम किया।
सम्मान और सिद्धांत
संगीत जगत में उनके योगदान को मान्यता देते हुए, जानकी को चार राष्ट्रीय पुरस्कारों सहित कई राज्य स्तर के सम्मान मिले। फिर भी उन्होंने 2022 में पद्म भूषण से इनकार कर दिया, यह कहते हुए कि यह सम्मान बहुत देर से आया है। यह निर्णय कई चर्चाओं को जन्म दिया, क्योंकि उन्होंने भारत रत्न की भी मांग की थी, जिससे उनका सिद्धांत और सम्मान दोबारा उजागर हुआ।
विरासत और भविष्य
छह दशकों तक लगातार गाए गए 40,000 से अधिक गीतों के माध्यम से, एस जानकी ने भारतीय फिल्म संगीत को नई ऊँचाइयों पर पहुंचाया। उनका संगीत न केवल फिल्म प्रेमियों के दिलों में बसा है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के संगीतकारों को भी प्रेरित करता रहेगा। उनका निधन भारतीय संगीत इतिहास में एक बड़ी शून्यता छोड़ गया है, पर उनका गीत हमेशा जीवित रहेगा।