गुजरात के कच्छ जिले में 'जम्पस्टार्ट' तकनीक से जन्म लिया गया दूसरा ग्रेट इंडियन बस्टर्ड चूजा 40 दिन जीवित रहा, जिससे संकटग्रस्त प्रजाति के संरक्षण में बड़ी उम्मीद जगी है। पर्यावरण मंत्री भूपेंदर यादव ने इस milestone को भारत की बस्टर्ड पुनरुज्जीवन योजना के लिए प्रमुख प्रगति बताया।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- गुजरात में द्वितीय बस्टर्ड चूजा 40 दिन जीवित रहा
- 'जम्पस्टार्ट' तकनीक ने प्राकृतिक प्रजनन को बढ़ावा दिया
- राष्ट्रपति और राज्य स्तर पर कैप्टिव ब्रीडिंग में 98 चूजे अब तक जन्मे
गुजरात के कच्छ जिले के नालिया क्षेत्र में दो साल पहले शुरू किए गए 'जम्पस्टार्ट' संरक्षण प्रयोग का दूसरा सफल उदाहरण सामने आया है। भारत के पर्यावरण मंत्री भूपेंदर यादव ने 10 जुलाई को बताया कि 21 मई को जन्मा चूजा 40‑दिन की सबसे नाज़ुक अवधि पार कर चुका है, जो इस संकटग्रस्त प्रजाति के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण संकेत है।
जम्पस्टार्ट तकनीक क्या है?
जम्पस्टार्ट एक अभिनव रणनीति है जिसमें जंगली बस्टर्ड के घोंसले में अंडा बाँझ हो तो उसे कैप्टिव‑ब्रीडिंग से प्राप्त फलदायी अंडे से बदल दिया जाता है। यह विधि माँ बस्टर्ड को प्राकृतिक रूप से अंडा फोड़ने, इन्क्यूबेट करने और चूजे को पालने की अनुमति देती है, जिससे जंगली परिप्रेक्ष्य में जीवित रहने की संभावनाएँ काफी बढ़ जाती हैं।
पहला प्रयास और उसकी चुनौतियाँ
पहला चूजा मार्च 26, 2026 को नालिया में हिचकिचाते हुए फूटे, लेकिन अप्रैल में वह गायब हो गया, जिससे वन अधिकारी चिंतित रहे कि वह शिकारियों की निशाने पर आया हो सकता है। यह घटना 'जम्पस्टार्ट' को जोखिमपूर्ण दिखा रही थी, परंतु इस विफलता ने तकनीक को परिष्कृत करने के लिए प्रेरित किया।
राजस्थान में कैप्टिव ब्रीडिंग की प्रगति
जैसे ही गुजरात में दो चरण सफल हुए, राजस्थान में भी कैप्टिव ब्रीडिंग ने उल्लेखनीय गति पकड़ी। यादव ने बताया कि सम और रामदेवरा अभयारण्य में अब तक 98 चूजे जन्मे हैं, जिससे प्राकृतिक प्रजनन के लिए संभावित माता‑पिता की संख्या धीरे‑धीरे बढ़ रही है। इस सफलता के बाद, वन्यजीव संस्थान (WII) और राज्य वन विभाग जल्द ही 'रीवाइल्डिंग' चरण में प्रवेश करने की योजना बना रहे हैं।
भविष्य की दिशा
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड को वर्तमान में 'क्रिटिकली एंडेंजरड' दर्जा मिला है, और उसकी अधिकांश जनसंख्या राजस्थान के मरुस्थल में केंद्रित है, जबकि कच्छ में केवल कुछ ही बचे हैं। 40‑दिन का जीवित रहना न केवल वैज्ञानिकों के लिए एक आँकड़ा है, बल्कि नीति निर्माताओं और संरक्षण कार्यकर्ताओं के लिए भी एक प्रेरणा है, जो इस प्रजाति को पुनःस्थापित करने के लिए निरंतर प्रयासरत हैं।