केरल के इडुक्कि में अफ्रीकी घोंघे की तीव्र वृद्धि ने इलायची बागों को नुकसान पहुँचाया है। केरल एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी (केएयू) ने किसानों को रोकथाम के उपाय दिखाए और सामूहिक कार्रवाई का आह्वान किया।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • आफ्रिकी घोंघे ने इडुक्कि के बायसन वैली पंचायत में छह वार्ड में बड़े पैमाने पर नुकसान किया है।
  • केएयू ने खाद्य जाल, तांबे के सल्फेट स्प्रे और कचरे की सफाई जैसे उपाय सुझाए हैं।
  • स्थानीय स्तर पर सहयोगी प्रयासों से भविष्य में इस कीट को नियंत्रित करने की उम्मीद है।

केरल के इडुक्कि जिले के बायसन वैली पंचायत में अफ्रीकी घोंघे (आफ्रिकन स्नेल) का अचानक उभरता प्रकोप स्थानीय इलायची (कार्डमम) बागों को गंभीर खतरा बन गया है। केरल एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी (केएयू) के अधिकारियों के अनुसार, यह कीट छह वार्ड में फैल चुका है, जहाँ बड़े पैमाने पर फसल क्षति दर्ज की गई है।

पृष्ठभूमि

अफ्रीकी घोंघा मूलतः अफ्रीका के उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पाया जाता है, लेकिन 2018 से केरल के विभिन्न जिलों में रिपोर्ट किया गया है। यह जीव तेज़ी से प्रजनन करता है और नमी व जैविक अपशिष्ट वाले वातावरण में पनपता है। बायसन वैली की बागों में सूखे पत्ते और जैविक कचरे की अधिकता ने घोंघे को आदर्श आवास प्रदान किया, जिससे उनकी जनसंख्या में तीव्र वृद्धि हुई।

प्रतिक्रिया और नियंत्रण उपाय

केएयू के विभाग नमीटोलॉजी के एसोसिएट प्रोफेसर आर. नारायण ने किसानों को मिलकर काम करने की सलाह दी। उन्होंने खाद्य जाल (फूड ट्रैप) स्थापित कर घोंघे को आकर्षित कर नष्ट करने का तरीका दिखाया। बायसन वैली कृषि अधिकारी स्मिथा एस. कुमार ने कहा कि बागों में सक्रिय कचरा हटाना आवश्यक है और तांबे के सल्फेट स्प्रे से फसल को सुरक्षा मिल सकती है। उन्होंने स्थानीय पंचायत और कृषि विभाग को समस्या की रिपोर्ट कर सहयोगी उपायों की शुरुआत की है।

स्थानीय सहयोग का महत्व

केएयू ने कोल्लम जिले के एझुकोन पंचायत में समान समस्या को सामुदायिक प्रयासों से नियंत्रित किया था। इस सफलता को मॉडल बनाकर बायसन वैली में भी किसान, पंचायत और विभागीय अधिकारियों को मिलकर काम करना चाहिए। कचरे की नियमित सफाई, जैविक अपशिष्ट का उचित निपटान और समय पर रासायनिक उपचार इस कीट प्रकोप को सीमित कर सकते हैं।

भविष्य की चुनौतियाँ

यदि घोंघे का प्रकोप जारी रहा तो इलायची उत्पादन में गिरावट आ सकती है, जिससे किसानों की आय पर असर पड़ेगा और राष्ट्रीय निर्यात में कमी आ सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि दीर्घकालिक समाधान के लिए पर्यावरणीय निगरानी, जैविक नियंत्रण (जैसे प्राकृतिक शत्रु) और सतत कृषि प्रथाओं को अपनाना आवश्यक है।