भारत भर में इस सप्ताह आर्द्र गर्मी की वापसी की संभावना है, जहाँ कई शहरों में महसूस‑तापमान 50°C तक पहुँच सकता है। मौसम विभाग ने स्वास्थ्य जोखिमों को कम करने के लिए चेतावनी जारी की है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • आर्द्र गर्मी इस हफ़्ते भारत के अधिकांश हिस्सों में फिर से बढ़ेगी
  • कई क्षेत्रों में महसूस‑तापमान 50°C के निकट पहुँच सकता है
  • सार्वजनिक स्वास्थ्य एजेंसियों ने जलयोजन और गर्मी‑संबंधी बीमारियों से बचाव के लिए विशेष सलाह जारी की है

भारत में इस सप्ताह का मौसम पूर्वानुमान दर्शाता है कि आर्द्रता के साथ तेज़ गर्मी फिर से देश के अधिकांश हिस्सों में महसूस होगी। विशेष रूप से उत्तर‑पूर्व, मध्य भारत और पश्चिमी तट के कुछ क्षेत्रों में महसूस‑तापमान 48°C‑50°C के बीच पहुँच सकता है, जबकि वास्तविक तापमान 42°C‑45°C के आसपास रहेगा।

पिछले गर्मी‑लहरों से सीख

पिछले दो वर्षों में भारत ने कई तीव्र गर्मी‑लहरों का सामना किया, जिनमें 2022 का ‘अतिरिक्त गर्मी‑सत्र’ और 2023 का ‘अत्यधिक आर्द्रता‑सत्र’ प्रमुख रहे। वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन इन लहरों की आवृत्ति और तीव्रता को बढ़ा रहा है, जिससे न केवल तापमान बल्कि आर्द्रता भी रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच रही है।

स्वास्थ्य पर संभावित प्रभाव

जब महसूस‑तापमान 50°C के करीब पहुँचता है, तो हाइपरथर्मिया, डिहाइड्रेशन और हृदय‑संबंधी समस्याओं का जोखिम काफी बढ़ जाता है। स्वास्थ्य विभाग ने विशेष रूप से बुजुर्ग, बच्चे और पुरानी बीमारियों से ग्रस्त लोगों को ठंडे स्थानों पर रहने, पर्याप्त पानी पीने और भारी शारीरिक परिश्रम से बचने की सलाह दी है। कई राज्य सरकारों ने ‘हीट वॉर्निंग’ चेतावनी जारी कर सार्वजनिक शीतलक केंद्र खोलने का प्रस्ताव भी रखा है।

कृषि और ऊर्जा पर असर

आर्द्र गर्मी का असर कृषि उत्पादन पर भी पड़ता है। फसल के विकास चरण में अत्यधिक तापमान से फसल के फूल और फलन में बाधा उत्पन्न हो सकती है, जिससे उत्पादन में गिरावट आ सकती है। साथ ही, बिजली की मांग में अचानक वृद्धि देखी गई है, क्योंकि एसी और पंखे की उपयोगिता में इजाफा होता है, जिससे ग्रिड पर दबाव बढ़ता है।

प्रशासनिक कदम और भविष्य की तैयारी

केंद्रीय मौसम विभाग ने अगले सात दिनों के लिए ‘उच्च तापमान चेतावनी’ जारी की है और सभी राज्य एजेंसियों को त्वरित सूचना प्रसार के लिए तैयार रहने का निर्देश दिया है। साथ ही, जल आपूर्ति प्रबंधन, शहरी हरित क्षेत्र की वृद्धि और दीर्घकालिक जलवायु अनुकूलन नीतियों को तेज करने की आवश्यकता पर बल दिया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी स्थितियों से निपटने के लिए सतत जलवायु रणनीतियों का निर्माण अनिवार्य है।