कोल्लम के काउंसिलर बी. अजित कुमार के लीवर, किडनी और कोरनीज़ को थिरुवनंतपुरम में पाँच रोगियों को नई जिंदगी देने के लिये तेज़ ग्रीन कॉरिडोर के माध्यम से भेजा गया।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- कोल्लम के मस्तिष्क मृत काउंसिलर के अंगों को थिरुवनंतपुरम तक पहुंचाने के लिये ग्रीन कॉरिडोर बनाया गया
- लीवर, दो किडनी और दो कोरनीज़ पाँच रोगियों को नई ज़िंदगी देंगे
- यह पहल राज्य में तेज़ और सुरक्षित अंग परिवहन का मॉडल स्थापित करती है
केरल में स्वास्थ्य मंत्रालय ने 22 जुलाई, 2026 को एक विशेष ग्रीन कॉरिडोर स्थापित किया, जिससे कोल्लम के 53 वर्षीया काउंसिलर बी. अजित कुमार के लीवर, किडनी और कोरनीज़ को थिरुवनंतपुरम तक तेज़ी से पहुँचाया जा सके। अजित कुमार, जो कुरीपूजा से थे, रविवार सुबह स्ट्रोक के कारण अस्पताल में भर्ती हुए और बुधवार सुबह ब्रेन‑डेड घोषित हुए। परिवार ने उनकी इच्छा के अनुसार अंग दान करने का निर्णय लिया।
लीवर को थिरुवनंतपुरम के KIMS अस्पताल में, एक किडनी को सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में और दूसरी कोल्लम के ट्रावांसकोर मेडिसिटी में भेजा गया। दो कोरनीज़ को थिरुवनंतपुरम के रीजनल इंस्टिट्यूट ऑफ ऑप्थाल्मोलॉजी को ट्रांसफर किया गया। इस तेज़ ट्रांसपोर्ट का शेड्यूल दोपहर 2 बजे कोल्लम से शुरू हुआ, जिससे रोगियों को समय पर अंग मिल सके।
तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (Historical Background)
भारत में अंग दान की औपचारिक व्यवस्था 1994 में राष्ट्रीय अंग दान अधिनियम के बाद शुरू हुई, लेकिन प्रतियों की कमी और लंबी परिवहन समय के कारण कई मामलों में जीवन‑रक्षा नहीं हो पाई। केरल ने 2015 में पहला राज्य‑व्यापी ऑर्गन डोनेशन प्रोग्राम शुरू किया, जिससे जागरूकता और दान दर में धीरे‑धीरे सुधार आया। ग्रीन कॉरिडोर जैसी तेज़ परिवहन व्यवस्था अभी तक सीमित रही है, लेकिन पिछले दो वर्षों में ट्रैफिक‑फ्री रूट्स का प्रयोग आपातकालीन रक्त और दवाओं के लिये सफल रहा है। यह पहल इस मॉडल को अंग परिवहन तक विस्तारित करती है, जिससे समय‑सेंसिटिव प्रक्रियाओं में सफलता की संभावना बढ़ती है।
Why This Matters (इसके मायने क्या हैं)
BozokMedia के विश्लेषण के अनुसार, ग्रीन कॉरिडोर न केवल रोगियों की जीवित रहने की दर में सुधार करेगा, बल्कि केरल में अंग दान के प्रति सार्वजनिक विश्वास को भी मजबूत करेगा। तेज़ डिलीवरी से ट्रांसप्लांट सर्जरी के बाद की जटिलताएँ घटेंगी, जिससे स्वास्थ्य खर्च में कमी आएगी और रोगियों की पुनर्वास अवधि कम होगी।
इसके अलावा, इस पहल से अन्य राज्यों में समान रूट्स स्थापित करने की प्रेरणा मिलेगी, जिससे राष्ट्रीय स्तर पर अंग उपलब्धता में उल्लेखनीय वृद्धि की उम्मीद है। यह कदम केरल की स्वास्थ्य सेवाओं को अंतरराष्ट्रीय मानकों के करीब लाने में सहायक सिद्ध होगा।
"हर मिनट की देरी का मतलब जीवन‑या मृत्यु का फैसला हो सकता है, इसलिए ग्रीन कॉरिडोर जैसी तेज़ व्यवस्था अनिवार्य है।" – डॉ. रवींद्र सिंह, ट्रांसप्लांट सर्जन
तुलनात्मक तालिका (Comparison Table)
| परिवहन विधि | औसत समय | सुरक्षा स्तर | लागत |
|---|---|---|---|
| परम्परागत डेड‑इंडियन ट्रांसपोर्ट | 4‑6 घंटे | मध्यम | उच्च |
| ग्रीन कॉरिडोर (नवीन) | 1‑2 घंटे | उच्च | मध्यम |
Frequently Asked Questions (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)
प्रश्न 1: ग्रीन कॉरिडोर केवल अंगों के लिए ही बनाया गया है?
उत्तर: वर्तमान में यह विशेष रूप से मस्तिष्क‑मृत दाताओं के महत्वपूर्ण अंगों (लीवर, किडनी, कोरनीज़) के लिए लागू है, लेकिन भविष्य में रक्त, दवाएँ और अन्य आपातकालीन सामग्रियों के लिये भी विस्तार की योजना है।
प्रश्न 2: क्या इस प्रक्रिया में दाता परिवार की सहमति अनिवार्य है?
उत्तर: हाँ, सभी अंग दान के लिये दाता या उनके वैध प्रतिनिधि की लिखित सहमति आवश्यक है, जैसा कि भारतीय ट्रांसप्लांट अधिनियम में निर्धारित है।