बिरभूम के चार प्रवासी, जिनमें दो नाबालिग शामिल थे, एक वर्ष से अधिक समय तक बांग्लादेश में फँसे रहने के बाद 8 जुलाई को मलदा जिले की सीमा से भारत लौट आए। इस वापसी को सुप्रीम कोर्ट की दखल और त्रिनामूल कांग्रेस के समर्थन ने संभव बनाया।
बिरभूम, पश्चिम बंगाल के चार बांग्लादेशी प्रवासियों को दिल्ली पुलिस ने 2025 में हिरासत में लेकर बांग्लादेश भेज दिया था। उनके साथ स्वीटी बीबी, उनके दो नाबालिग पुत्र, तथा सुनाली खातून और उनके नाबालिग बेटे का समूह शामिल था। यह समूह बांग्लादेश में एक वर्ष से अधिक समय तक रहकर अंततः 8 जुलाई 2026 को भारत-बांग्लादेश सीमा के मलदा जिले से लौट आया।
पृष्ठभूमि और प्रारम्भिक हिरासत
2025 में दिल्ली में एक आपराधिक मामले के दौरान इन चार व्यक्तियों को अवैध प्रवासियों के रूप में वर्गीकृत कर बांग्लादेश भेज दिया गया। यह कदम अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों और कई नागरिक समूहों द्वारा गंभीर रूप से निंदा किया गया, क्योंकि उनके पास भारतीय नागरिकता के स्पष्ट प्रमाण थे। विशेष रूप से, सुनाली खातून गर्भवती थीं और उनका नाबालिग पुत्र भारत में जन्म लेने की आशा रखता था।
कानूनी लड़ाई और सुप्रीम कोर्ट की भूमिका
बंगाल में स्थित मानवाधिकार वकीलों ने तत्काल न्यायालयीय राहत की मांग की। दिसंबर 2025 में सुनाली खातून और उनके बेटे को बांग्लादेश से भारत वापस लाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप किया। कोर्ट ने बांग्लादेश को लिखित आदेश जारी करने को कहा, जिसमें कहा गया कि ‘अवैध रूप से निकाले गए भारतीयों को तुरंत भारत में लौटाया जाए’। इस आदेश के बावजूद बांग्लादेशी अधिकारियों ने प्रक्रिया में देरी की, जिससे वापसी में अतिरिक्त एक वर्ष लग गया।
वापसी की प्रक्रिया और सीमा पर स्वागत
जुलाई 2026 में, बांग्लादेशी अधिकारियों ने अंततः भारतीय नागरिकों को पहचान पत्र और वैध दस्तावेज़ों के साथ भारत-बांग्लादेश सीमा पर भेजा। मलदा जिले के सुरक्षा बलों ने उन्हें गर्मजोशी से स्वागत किया और तुरंत स्थानीय पुलिस स्टेशन में ले जाकर औपचारिक प्रक्रिया पूरी की। लौटते समय सभी चार व्यक्तियों ने अपने अनुभवों को वीडियो में दर्ज किया, जिसमें उन्होंने तत्काल मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से पुनर्वास की अपील की थी।
राजनीतिक प्रतिक्रिया और सामाजिक प्रभाव
त्रिनामूल कांग्रेस के नेता समीरुल इस्लाम ने सोशल मीडिया पर इस वापसी की सराहना की और कहा, “अवैध प्रवासियों की निकासी में कोई आपत्ति नहीं, पर असली भारतीयों को अन्याय सहन नहीं करना चाहिए।” इस बयान ने राष्ट्रीय स्तर पर बहस को तेज कर दिया, जहाँ कई विपक्षी दलों ने सरकार की सीमा सुरक्षा नीतियों पर प्रश्न उठाए।
भविष्य की संभावनाएँ और नीति सुझाव
यह घटना भारतीय-बांग्लादेशीय सीमा प्रबंधन में पारदर्शिता और मानवीय अधिकारों के पालन की आवश्यकता को उजागर करती है। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में समान मामलों से बचने के लिए दो देशों के बीच एक सुदृढ़ द्विपक्षीय समझौता और तेज़ न्यायिक प्रक्रिया स्थापित करनी चाहिए। साथ ही, प्रवासी कल्याण बोर्ड को सशक्त कर शरणार्थियों के लिए त्वरित राहत प्रदान करने की व्यवस्था करनी होगी।