नाटो के हालिया शिखर सम्मेलन ने सैन्य क्षमता को रक्षा का मुख्य आधार बताया, जिससे मिलिटरिज़्म की अवधारणा पर नया सवाल उठता है। इस लेख में मिलिटरिज़्म की परिभाषा, इतिहास और आज के अंतरराष्ट्रीय राजनीति में उसके प्रभाव की गहन जांच की गई है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- मिलिटरिज़्म का अर्थ केवल सैन्य शक्ति नहीं, बल्कि सामाजिक‑राजनीतिक संरचना में उसका गहरा प्रभाव है।
- नाटो के शिखर सम्मेलन ने सामूहिक रक्षा के लिए सैन्य तत्परता को प्राथमिकता दी, जो मिलिटरिज़्म की धारा को पुनः सुदृढ़ करता है।
- इतिहास में फ्रांस, प्रुशिया और फासीवादी राजशाहियों ने मिलिटरिज़्म को राष्ट्रीय नीति का केंद्र बनाया।
जुलाइ 8 को टर्की के अंकारा में आयोजित नाटो शिखर सम्मेलन ने अपने घोषणा‑पत्र में लेख 5 के तहत “संग्रहीत रक्षा” के प्रति “अटल प्रतिबद्धता” की पुष्टि की। साथ ही यह बताया गया कि गठबंधन की प्रतिरोधक क्षमता और रक्षा का आधार नाभिकीय, पारंपरिक और मिसाइल रक्षा क्षमताओं के साथ‑साथ अंतरिक्ष और साइबर संसाधनों पर निर्भर है। इस स्पष्ट सैन्य‑केन्द्रित रुख ने मिलिटरिज़्म के प्रश्न को फिर से उजागर किया।
मिलिटरिज़्म की परिभाषा और इतिहास
सामान्यतः मिलिटरिज़्म को “मजबूत सैन्य शक्ति में विश्वास और उसे राष्ट्रीय नीति का मुख्य स्तम्भ मानना” के रूप में समझा जाता है। यह “मिलिटराइज़ेशन” से अलग है, जहाँ नागरिक संस्थाएँ और समाज धीरे‑धीरे सैन्य अभ्यास, मूल्यों और संरचनाओं को अपनाते हैं। 19वीं सदी के यूरोप में यह शब्द फ्रांस (नापोलीयन III के अधीन) और प्रुशिया जैसे राज्यों में उपयोग हुआ, जहाँ सैन्य शक्ति ने राजनीति और सामाजिक जीवन पर हावी हो गई। इटली, जर्मनी, स्पेन और जापान में फासीवादी शासनों ने भी इस अवधारणा को अपने अधिकार के उपकरण के रूप में लागू किया।
विचारधारा के रूप में मिलिटरिज़्म
समाजशास्त्री माइकल मान ने मिलिटरिज़्म को “ऐसी सामाजिक मान्यताएँ और प्रथाएँ जो युद्ध और युद्ध‑तैयारी को सामान्य तथा वांछित सामाजिक गतिविधि मानती हैं” कहा है। अल्फ़्रेड वैग्ट्स ने तर्क दिया कि यह केवल बल प्रयोग नहीं, बल्कि सैन्य संस्थाओं, नीतियों और मूल्यों का नागरिक समाज पर अत्यधिक प्रभाव है। इस दृष्टिकोण से मिलिटरिज़्म को एक विचारधारा माना जा सकता है जिसमें सैन्य शक्ति को वैध और अनिवार्य माना जाता है।
आधुनिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति में प्रभाव
वर्तमान में, वैश्विक शक्ति संतुलन में सैन्य तैयारियों का महत्व बढ़ता जा रहा है। नाटो जैसी गठबंधन संस्थाएँ अपने सदस्य देशों को सामूहिक सुरक्षा के सन्दर्भ में “डिटरेंस” (निवारण) के साधन के रूप में सैन्य शक्ति पर भरोसा करने के लिए प्रेरित करती हैं। यह न केवल रणनीतिक सुरक्षा को सुदृढ़ करता है, बल्कि सामाजिक‑राजनीतिक स्तर पर सैन्य शक्ति को सामान्यीकृत करने की प्रवृत्ति को भी तेज़ करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की “सैन्य‑सामाजिक” मान्यता भविष्य में संघर्षों के समाधान में कूटनीति के बजाय बल प्रयोग को प्राथमिकता दे सकती है।
भविष्य की दिशा
जैसे-जैसे तकनीकी प्रगति अंतरिक्ष, साइबर और स्वायत्त हथियार प्रणालियों को सशक्त बनाती है, मिलिटरिज़्म की परिभाषा भी विस्तारित हो रही है। नीति निर्माताओं को यह समझना आवश्यक है कि केवल सैन्य शक्ति पर निर्भरता ही नहीं, बल्कि सामाजिक मान्यताओं, कानूनी ढांचों और अंतर्राष्ट्रीय नियमों के साथ संतुलन बनाकर ही स्थायी शांति सुनिश्चित की जा सकती है।