मद्रास हाईकोर्ट पल्लिकरणई आर्द्रभूमि के आसपास 1 किमी के दायरे में एनजीटी द्वारा लगाए गए निर्माण प्रतिबंध की वैधता की जांच करेगा। यह मामला 3,474 हेक्टेयर भूमि और हजारों भूस्वामियों के अधिकारों से जुड़ा है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- मद्रास हाईकोर्ट 3 अगस्त को एनजीटी के निर्माण प्रतिबंध पर अंतिम सुनवाई करेगा।
- एनजीटी ने पल्लिकरणई रामसर साइट के 1 किमी के दायरे में निर्माण पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया है।
- CREDAI-चेन्नई का तर्क है कि यह प्रतिबंध 3,474 हेक्टेयर क्षेत्र में रहने वाले हजारों लोगों के लिए अन्यायपूर्ण है।
- CMDA के अनुसार, प्रतिबंधित क्षेत्र का 84% हिस्सा पहले से ही घनी आबादी वाला है।
मद्रास उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई के लिए 3 अगस्त, 2026 की तारीख तय की है। यह मामला राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) द्वारा पल्लिकरणई आर्द्रभूमि (Pallikaranai marshland), जो कि एक महत्वपूर्ण रामसर साइट है, के चारों ओर 1 किलोमीटर के दायरे में निर्माण कार्यों पर लगाए गए पूर्ण प्रतिबंध की वैधता से संबंधित है।
विवाद का मुख्य कारण
CREDAI-चेन्नई ने इस प्रतिबंध को चुनौती देते हुए अदालत से जल्द सुनवाई की मांग की थी। संस्था का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ वकील पी.एस. रमन ने तर्क दिया कि एनजीटी का यह आदेश चेन्नई के लगभग 3,474 हेक्टेयर (8,584.44 एकड़) क्षेत्र को प्रभावित कर रहा है। इस प्रतिबंध के कारण पुझुथिवक्कम, मदिपक्कम, वेलचेरी और शोलिंगनल्लूर जैसे प्रमुख इलाकों के हजारों भूस्वामियों को भारी आर्थिक और कानूनी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
CMDA और TNSWA का पक्ष
चेन्नई महानगर विकास प्राधिकरण (CMDA) ने अदालत को सूचित किया कि एनजीटी के आदेश के कारण भवन निर्माण की अनुमति के हजारों आवेदन लंबित हैं। सांख्यिकीय डेटा प्रस्तुत करते हुए CMDA ने बताया कि प्रतिबंधित क्षेत्र का लगभग 84.2% हिस्सा पहले से ही घनी आबादी वाला है और वहां हजारों इमारतें पहले से ही मौजूद हैं। CMDA का तर्क है कि 'प्रभाव क्षेत्र' (Zone of Influence) को अंतिम रूप दिए बिना इतना बड़ा प्रतिबंध लगाना उचित नहीं है।
वैज्ञानिक अध्ययन बनाम शहरी विकास
दूसरी ओर, तमिलनाडु राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण (TNSWA) ने स्पष्ट किया कि 'प्रभाव क्षेत्र' का निर्धारण एक जटिल वैज्ञानिक प्रक्रिया है। इसमें जल विज्ञान संबंधी मूल्यांकन (Hydrological assessments) और पारिस्थितिक कारकों का अध्ययन शामिल है। प्राधिकरण का कहना है कि एकीकृत प्रबंधन योजना (IMP) के पूरा होने के बाद ही वैज्ञानिक आधार पर सीमाएं तय की जा सकती हैं। अब सबकी निगाहें 3 अगस्त को होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं, जो चेन्नई के शहरी विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन तय करेगी।