40 साल पहले 10 जुलाई 1986 को अहमदाबाद के दीवारबंद शहर में रथ यात्रा के दौरान भड़क उठी सामुदायिक दंगे ने 11 लोगों की जान ली और लगभग 80 घायल हुए। इस लेख में उस घटना की पृष्ठभूमि, राजनीतिक असर और आज के भारत में इसकी सीखों का विश्लेषण किया गया है।
10 जुलाई 1986 को अहमदाबाद के दीवारबंद शहर के दरियापुर‑शाहपुर क्षेत्रों में वार्षिक रथ यात्रा के दौरान घातक सामुदायिक दंगे छिड़ गए। रथ यात्रा के दौरान चंदन तालावड़ी इलाके में पत्थर बरसाने की घटना ने भीड़ को विचलित कर दिया, जिससे 11 मृतकों और लगभग 80 घायल लोगों को झेलना पड़ा। स्थानीय प्रशासन ने तुरंत अनिश्चितकालीन कर्फ्यू लागू कर दिया, जबकि पुलिस ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए लाठी चार्ज किया।
इतिहासिक पृष्ठभूमि
अहमदाबाद में 1980 के दशक में कई बार सामुदायिक तनाव देखे गए थे, विशेषकर 1985 के बड़ौदा दंगे और 1992 के गुजरात दंगे के बीच। 1986 का दंगा इस क्रम में एक महत्वपूर्ण मोड़ था, क्योंकि यह रथ यात्रा जैसे धार्मिक उत्सव के दौरान हुआ, जिससे धार्मिक भावनाओं को भड़काने वाला माहौल तैयार हो गया। इस समय गुजरात में राजनीतिक अस्थिरता, बिचौलियों की भूमिका और आर्थिक असमानता ने हिंसा को तेज़ किया।
राजनीतिक एवं प्रशासनिक प्रभाव
दंगे के साथ ही उसी दिन केंद्र के पेट्रोलियम मंत्री चंद्र शेखर सिंह की मृत्यु की खबर आई। सिंह, जो पहले बिहार के मुख्यमंत्री भी रह चुके थे, एआईएमएस में लिवर कैंसर के इलाज में थे और उनका निधन 60 वर्ष की आयु में हुआ। उनके निधन ने राष्ट्रीय स्तर पर एक शोक की लहर पैदा की और केंद्र सरकार को इस संवेदनशील समय में शांति बहाल करने की चुनौती का सामना करना पड़ा।
समानांतर घटनाएँ
उसी दिन हरियाणा में एक संग्राम समिति की बैठक में भी हिंसा हुई, जहाँ लाक दल के समर्थकों ने लाठी चार्ज के जवाब में कई वाहन और एक फर्नीचर की दुकान को आग लगा दी। पुलिस ने 200 लोगों को गिरफ्तार किया। इसके अलावा, श्रीलंका के उत्तरी शहर त्रिनकोमली में 21 लोगों की मौत के बाद कर्फ्यू लगाया गया, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सामुदायिक तनाव की चिंताएँ बढ़ीं।
आज की सीख
40 साल बाद भी अहमदाबाद के इस दंगे की धड़कन भारत में सामुदायिक शांति की चुनौतियों को उजागर करती है। विशेषज्ञों का मानना है कि धार्मिक यात्राओं के दौरान सुरक्षा प्रबंधन, स्थानीय प्रशासन की तत्परता और सामाजिक संगठनों की भूमिका को पुनः परिभाषित करना आवश्यक है। इतिहास से सीख लेकर, वर्तमान में नीतिनिर्माताओं को बहु-धर्मीय संवाद को सुदृढ़ करना चाहिए, ताकि भविष्य में ऐसी हिंसा को रोका जा सके।