AIIMS दिल्ली की अंतिम फोरेंसिक रिपोर्ट ने ट्विशा शर्मा की मौत के मामले में जिम बेल पर पीड़िता की त्वचा के टिश्यू की पुष्टि की। इस वैज्ञानिक सबूत को सीबीआई ने स्वीकार किया और जांच में नई दिशा दी गई।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- AIIMS दिल्ली ने जिम बेल पर त्वचा के टिश्यू की पुष्टि की।
- रिपोर्ट ने लिगेचर पैटर्न को पीड़िता की गर्दन के घाव से मिलाया।
- सीबीआई इस वैज्ञानिक साक्ष्य को केस की आगे की जांच में उपयोग करेगा।
ट्विशा शर्मा की मौत से जुड़ी जांच ने मध्य प्रदेश में सामाजिक एवं कानूनी बहस को फिर से उजागर किया है। 12 मई को भोपाल के अपने वैवाहिक घर में लटकी मिली वह 33‑वर्षीय पूर्व मॉडल‑अभिनेत्री, जिसकी शादी पिछले साल दिसंबर में वकील समर्थ सिंह से हुई थी। शुरुआती पोस्ट‑मॉर्टेम ने ‘लिगेचर द्वारा पूर्व‑मृत्यु लटकाव’ कहा, परन्तु परिवार ने लिगेचर का कोई ठोस सबूत न मिलने पर हाई कोर्ट को दोबारा ऑटोप्सी का आदेश दिया।
AIIMS दिल्ली की फोरेंसिक जांच
हाई कोर्ट के आदेश के बाद AIIMS दिल्ली के पाँच सदस्यीय मेडिकल बोर्ड ने 24 मई को दूसरा पोस्ट‑मॉर्टेम किया। दो सप्ताह बाद, 10 जुलाई को उन्होंने 11 पृष्ठों की विस्तृत रिपोर्ट सीबीआई को सीलबंद लिफाफे में सौंप दी। रिपोर्ट में जिम बेल (जिसके अंत में धातु की रिंग लगी थी) पर पीड़िता की त्वचा के टिश्यू की मौजूदगी पाई गई, जो गर्दन पर लिगेचर मार्क के साथ पूरी तरह मेल खाती है। इस निष्कर्ष को AIIMS दिल्ली के फॉरेंसिक मेडिसिन प्रमुख डॉ. सुधीर गुप्ता ने “वैज्ञानिक रूप से स्पष्ट और न्याय के हित में” कहा।
सीबीआई की प्रतिक्रिया और आगे की कार्यवाही
रिपोर्ट प्राप्त करने के बाद सीबीआई ने तुरंत इसे अपनी जांच में शामिल कर लिया। एजेंसी ने बेल को फॉरेंसिक लैब में विस्तृत विश्लेषण के लिए भेजा, साथ ही घटना स्थल की पुनरावृत्ति के लिए डमी का उपयोग किया। इस कदम से यह स्पष्ट होता है कि अब केस केवल सामाजिक कारणों (जैसे दहेज) पर नहीं, बल्कि ठोस वैज्ञानिक साक्ष्य पर आधारित होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह रिपोर्ट अदालत में निर्णायक साक्ष्य बन सकती है, जिससे दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई संभव हो सकेगी।
पृष्ठभूमि: दहेज विवाद और घरेलू उत्पीड़न
ट्विशा के परिवार ने लगातार कहा कि शादी के बाद दहेज की असंतोषजनक राशि और ससुराल वालों द्वारा मानसिक उत्पीड़न ने उन्हें आत्महत्या की ओर धकेला। इस प्रकार के मामलों में अक्सर सामाजिक दबाव और न्याय प्रणाली की अक्षमता को उजागर किया जाता है। अब AIIMS की वैज्ञानिक रिपोर्ट के साथ, यह केस दहेज के खिलाफ सख्त कानूनों की आवश्यकता को भी पुनः स्थापित कर सकता है।
भविष्य की संभावनाएँ
यदि कोर्ट इस फॉरेंसिक सबूत को स्वीकार करती है, तो यह न केवल ट्विशा शर्मा के परिवार को न्याय दिला सकता है, बल्कि भविष्य में समान मामलों में फॉरेंसिक ऑटोप्सी को अनिवार्य बनाने की दिशा में एक मिसाल स्थापित करेगा। साथ ही, यह जांच प्रक्रिया में स्वतंत्र वैज्ञानिक संस्थानों की भूमिका को भी सुदृढ़ करेगा।