भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्रीय जांच एजेंसी (CBI) और प्रवर्तन निदेशालय (ED) को रिलायंस अनिल धीरूभाई अंबानी समूह (ADAG) के वित्तीय घोटाले की जांच में प्रमुख भूमिका निभाने का अधिकार दिया। न्यायालय ने कहा कि वह जांच के क्रम को तय नहीं कर सकता, जबकि किसी भी टिप्पणी का प्रभाव परीक्षण पर पड़ सकता है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • सुप्रीम कोर्ट ने CBI और ED को ADAG जांच का संचालन करने की अनुमति दी
  • न्यायालय ने किसी भी टिप्पणी को मामले के परीक्षण पर प्रभाव डालने वाला मानते हुए हिचकिचाहट दिखाई
  • जांच में 20,000 करोड़ रुपये से अधिक के सार्वजनिक बैंक नुकसान का आरोप

नई दिल्ली (13 जुलाई, 2026) – भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक तीन-न्यायाधीशीय पैनल के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि वह वर्तमान में चल रही रिलायंस अनिल धीरूभाई अंबानी समूह (ADAG) के वित्तीय धोखाधड़ी मामले में जांच की दिशा तय नहीं कर सकता। इसके बजाय, कोर्ट ने केंद्रीय जांच एजेंसी (CBI) और प्रवर्तन निदेशालय (ED) को पूरी जांच का नेतृत्व करने की अनुमति दी।

पृष्ठभूमि और ऐतिहासिक संदर्भ

रिलायंस ADAG समूह पर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को 20,000 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान पहुँचाने का आरोप है। इस मामले में कई उच्च-स्तरीय अधिकारियों को गिरफ़्तार किया गया, जबकि प्रतिवादी अंबानी परिवार ने कहा कि केवल “निचले स्तर” के अधिकारियों को ही पकड़ा गया है। इस विवाद ने न्यायिक प्रक्रिया और जांच एजेंसियों के अधिकारों के बीच तनाव को उजागर किया।

सुप्रीम कोर्ट की भूमिका और टिप्पणी

मुख्य न्यायाधीश सुर्जकांत ने अदालत को इस बात से रोकते हुए कहा कि “जांच के दौरान सुप्रीम कोर्ट की कोई भी टिप्पणी, चाहे अनजाने में ही क्यों न हो, परीक्षण पर असर डाल सकती है।” उन्होंने इस बात को दोहराया कि वह यह नहीं तय कर सकते कि कौन गिरफ्तार किया जाना चाहिए या कब किया जाना चाहिए। यह रुख न्यायिक स्वतंत्रता और निष्पक्ष परीक्षण के सिद्धांतों को सुदृढ़ करता है।

जाँच एजेंसियों का पक्ष

सॉलिसिटर जनरल तुशार मेहता ने बताया कि अब तक सात मामलों में तीन चार्जशीट दायर हो चुकी हैं और शेष मामलों की जांच चल रही है। उन्होंने कहा कि एजेंसियों ने अपनी स्थिति रिपोर्ट शीर्ष न्यायालय में पेश करने के लिए तैयार कर ली है। ED ने चार अभियोजन शिकायतें अलग से दायर की हैं, जबकि CBI ने रिलायंस कमर्शियल फाइनेंस केस में सात चार्जशीट दायर की हैं।

भविष्य की संभावनाएँ

जाँच एजेंसियों को अब पूरी स्वतंत्रता मिलने से यह अपेक्षा की जा रही है कि वे सभी लेन‑देनों की गहन जांच करेंगे, जिसमें संभावित ‘धन की निकासी’ और बैंक अधिकारियों की भागीदारी शामिल है। यदि आरोप सिद्ध होते हैं, तो यह सार्वजनिक वित्तीय प्रणाली में विश्वास को पुनर्स्थापित करने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम होगा। साथ ही, यह मामलों में न्यायालय की सीमित भागीदारी को भी रेखांकित करता है, जिससे भविष्य में समान मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप कम हो सकता है।