केरल उच्च न्यायालय ने वक्फ बोर्ड के महत्वपूर्ण कार्यों, नीतिगत निर्णयों और पूंजीगत व्यय पर रोक लगा दी है। अदालत ने बोर्ड के गठन में कानूनी विसंगतियों को पाया है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • केरल उच्च न्यायालय ने वक्फ बोर्ड के प्रमुख कार्यों और न्यायिक गतिविधियों पर तत्काल रोक लगा दी है।
  • बोर्ड का वर्तमान गठन 'UMEED अधिनियम, 2025' के अनिवार्य प्रावधानों का उल्लंघन करता है।
  • अदालत ने गैर-मुस्लिम और शिया समुदाय के प्रतिनिधित्व की कमी पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
  • राज्य सरकार ने कानून के अनुपालन में बोर्ड का पुनर्गठन करने की सहमति दी है।

कोच्चि: केरल उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए केरल राज्य वक्फ बोर्ड के प्रमुख कार्यों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश सौमेन सेन और न्यायमूर्ति वी.एम. श्याम कुमार की खंडपीठ ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि बोर्ड अब अदालत की स्पष्ट अनुमति के बिना कोई भी बड़ा नीतिगत निर्णय नहीं ले सकता, पूंजीगत व्यय नहीं कर सकता और न ही अपनी न्यायिक शक्तियों का प्रयोग कर सकता है।

कानूनी उल्लंघन और UMEED अधिनियम का मुद्दा

अदालत का यह कड़ा रुख 'एकीकृत वक्फ प्रबंधन, सशक्तिकरण, दक्षता और विकास अधिनियम (UMEED Act), 2025' के उल्लंघन के कारण आया है। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि वर्तमान बोर्ड का गठन इस कानून के तहत निर्धारित अनिवार्य मानदंडों का पालन नहीं करता है। अधिनियम के अनुसार, बोर्ड में दो गैर-मुस्लिम सदस्यों और एक शिया सदस्य का प्रतिनिधित्व होना अनिवार्य है। वर्तमान में बोर्ड में नौ सदस्य हैं, लेकिन उनमें गैर-मुस्लिम और शिया समुदायों की अनुपस्थिति देखी गई है।

राजनीतिक नियुक्तियों और भूमि विवाद पर सवाल

मामला केवल संरचनात्मक नहीं है, बल्कि इसमें राजनीतिक नियुक्तियों और भूमि प्रबंधन के गंभीर आरोप भी शामिल हैं। एक याचिका में सीपीआई(एम) नेता के.एस. हंसा की अध्यक्ष के रूप में नियुक्ति को चुनौती दी गई है। इसके अतिरिक्त, असेंबली ऑफ क्रिश्चियन ट्रस्ट सर्विसेज (ACTS) ने मुनंबम में 404 एकड़ तटीय भूमि को वक्फ पोर्टल पर अपलोड करने की वैधता पर भी सवाल उठाए हैं।

राज्य सरकार की प्रतिक्रिया और भविष्य की दिशा

सुनवाई के दौरान, राज्य सरकार ने अदालत को सूचित किया कि वह विभिन्न जनहित याचिकाओं (PIL) में उठाए गए आरोपों पर विचार करने के बाद, UMEED अधिनियम के प्रावधानों के अनुरूप बोर्ड का पुनर्गठन करने के लिए तैयार है। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई एक सप्ताह बाद तय की है, तब तक बोर्ड की शक्तियां सीमित रहेंगी।