पंजाब में लाखों सरकारी कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को दयरेनेस अलाउंस (DA) के बकाया भुगतान में देरी को लेकर भाजपा ने एमएपी की तरह 'ममता‑स्टाइल' राजनीति का इशारा किया। पार्टी ने वित्तीय तर्कों को झुठला कर सरकार पर वैध अधिकारों की अनदेखी का आरोप लगाया।
भगवंत मान के नेतृत्व में एएपी‑शासन ने पंजाब के सरकारी कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को दयरेनेस अलाउंस (DA) के बकाया भुगतान को टालते हुए भाजपा द्वारा "ममता‑स्टाइल" राजनीति का आरोप लगाया है। यह मुद्दा तब उभरा जब पंजाब भाजपा के केवल सिंह ढिल्लों ने कहा कि सरकार "वित्तीय तंगी" का हवाला देकर कर्मचारियों को उनके कानूनी हक़ से वंचित कर रही है।
पृष्ठभूमि
दायरेनेस अलाउंस, जो महंगाई के प्रभाव को कम करने के लिये कर्मचारियों को अतिरिक्त वेतन के रूप में दिया जाता है, कई सालों से भारतीय राज्यों में विवाद का केंद्र रहा है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के तहत ममता बनर्जी के शासन में भी समान देरी देखी गई थी, जहाँ भाजपा ने इस मुद्दे को चुनावी एजेंडा में बदल दिया था। पंजाब में भी एएपी ने समान तर्क प्रस्तुत किया, लेकिन विपक्ष ने इसे "कॉपी‑पेस्ट" कर कहा।
कानूनी पहलू
पंजाब‑हरियाणा उच्च न्यायालय ने 2026 में सुरिंदर सिंह बनाम पंजाब राज्य मामले में स्पष्ट किया कि दायरेनेस अलाउंस एक कानूनी अधिकार है, दान नहीं। न्यायाधीश हरप्रीत सिंह बरर ने राज्य को बकाया राशि के साथ ब्याज दंड भी देने का आदेश दिया, यह कहते हुए कि पे कमिशन की सिफ़ारिशों को स्वीकृत करने के बाद भुगतान को अनिश्चितकाल तक टालना असंवैधानिक है। हालांकि, एएपी सरकार ने आदेशों के कुछ भाग को चुनौती दी, जिससे प्रक्रिया और लंबी हो गई।
राजनीतिक प्रभाव
भाजपा ने इस मुद्दे को "पहले बार इतिहास में" कहा, जहाँ सरकार कर्मचारियों को उनके मूलभूत अधिकारों से वंचित कर रही है। यह बयान एएपी के चुनावी वादों – “सभी कर्मचारियों को समान अधिकार” – के साथ टकराव में है। पंजाब में एएपी के खिलाफ इस आरोप से विपक्षी पार्टियों को नई ऊर्जा मिली है, जबकि केंद्र सरकार और अन्य बीजेपी‑शासित राज्यों ने नियमित DA रिलीज़ का हवाला देकर एएपी को ‘वित्तीय अटकलों’ का आरोप लगा रहे हैं।
आगे का रास्ता
केवल न्यायालय की आदेश ही नहीं, बल्कि राजनैतिक दबाव भी एएपी को बकाया भुगतान को शीघ्रता से पूरा करने के लिये प्रेरित कर सकता है। यदि एएपी इस विवाद को अपने लिए राजनीतिक लाभ में बदल पाता है, तो यह भविष्य में अन्य राज्यों में भी DA‑संबंधी नीतियों को प्रभावित कर सकता है।