कर्नाटक हाई कोर्ट ने राज्य चुनाव आयोग (SEC), भारत निर्वाचन आयोग (ECI) और राज्य सरकार को नोटिस जारी करके महादेवपुरा विधानसभा क्षेत्र में समानांतर विशेष तीव्र पुनरावलोकन (SIR) के वैधता पर सवाल उठाया है। यह आदेश एक याचिका पर आया है जिसमें मतदाता सूची में दोहराव, झूठे पते और फोटोग्राफ़ की गलतियों का आरोप है।
कर्नाटक हाई कोर्ट ने बुधवार को न्यायाधीश सूरज गोविंदराज द्वारा एक याचिका पर आदेश सुनाया, जिसमें राज्य चुनाव आयोग (SEC) के महादेवपुरा विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत ग्रेटर बेंगलुरु अथॉरिटी (GBA) वार्ड्स में समानांतर विशेष तीव्र पुनरावलोकन (SIR) के आदेश की वैधता पर प्रश्न उठाया गया। यह याचिका विवेक एम. और चार अन्य पंजीकृत मतदाताओं द्वारा दायर की गई थी, जो इस पुनरावलोकन प्रक्रिया को अनुचित मानते हैं।
पृष्ठभूमि
23 वार्ड्स में SEC ने 19 जून को विशेष तीव्र पुनरावलोकन का आदेश दिया, जबकि भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने 16 जून को सभी विधानसभा क्षेत्रों की मतदाता सूची को स्थिर (फ्रीज) कर दिया था। SEC का यह कदम एक शिकायत पर आया था, जिसमें कांग्रेस के उप सचिव मानसूर अली खान ने कहा था कि मतदाता सूची में लगभग 13,000 डुप्लिकेट नाम, 40,000 नकली पते, 4,000 असत्य फोटो और 33,000 फॉर्म‑6 के दुरुपयोग के उदाहरण हैं।
SEC का आदेश
SEC ने बेंगलुरु नॉर्थ सिटी कॉरपोरेशन के 23 वार्ड्स और बेंगलुरु साउथ सिटी कॉरपोरेशन के कासवन्हली वार्ड में एक स्वतंत्र SIR का प्रस्ताव रखा। इस प्रक्रिया में मतदाता सूची को फिर से जांचने, त्रुटियों को सुधारने और 31 जुलाई तक अंतिम सूची प्रकाशित करने की योजना थी। इसके तहत एक अलग फ्रीज तिथि और तेज़ शेड्यूल निर्धारित किया गया, जिससे ECI के केंद्रीकृत SIR के साथ असंगतियां पैदा हो सकती थीं।
न्यायालय का आदेश
कोर्ट ने SEC, ECI और राज्य सरकार को नोटिस जारी कर कहा कि SEC के पास स्वतंत्र रूप से SIR करने का अधिकार नहीं है, क्योंकि भारतीय संविधान के तहत उसका कार्य केवल ECI द्वारा तैयार की गई विधानसभा मतदाता सूची को अपनाना है। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि GBA एक्ट की धारा को अगर SEC को स्वतंत्र पुनरावलोकन का अधिकार देने के रूप में व्याख्यायित किया जाए, तो वह संवैधानिक अनुच्छेद 325 और 326 के तहत एकीकृत मतदाता सूची के सिद्धांत का उल्लंघन करेगा।
संवैधानिक एवं व्यावहारिक पहलू
कायर्यात्मक रूप से दो अलग-अलग मतदाता सूचियां तैयार करना न केवल सार्वजनिक धन की बेतहाशा बर्बादी है, बल्कि मतदाता भ्रम और चुनावी प्रक्रिया में भरोसे की कमी भी पैदा कर सकता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि SEC ने बिना ECI के साथ समन्वय किए ऐसा कदम उठाया है, जिससे दो विरोधी सूचनाओं के बीच मतदाता की पहचान में असंगतियां उत्पन्न हो सकती हैं।
भविष्य के प्रभाव
यदि कोर्ट SEC के आदेश को रोकता है, तो आगामी विधानसभा चुनाव में एक ही मतदाता सूची का उपयोग सुनिश्चित होगा, जिससे चुनावी पारदर्शिता और वैधता बनी रहेगी। दूसरी ओर, यदि दोहरी सूची जारी रहती है, तो चुनाव परिणामों की वैधता पर सवाल उठ सकते हैं, जो भविष्य में न्यायिक जांच और संभावित विधायी सुधार की ओर इशारा करेगा।
यह मामला भारतीय लोकतंत्र की बुनियादी संरचनाओं—मतदाता सूची की एकता, संवैधानिक अधिकार और संस्थागत सहयोग—के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता को रेखांकित करता है।