केरल सरकार की 'प्रियांधर्शिनी' योजना, जो महिलाओं को मुफ्त बस यात्रा प्रदान करती है, वित्तीय अस्थिरता का कारण बन रही है। सार्वजनिक और निजी परिवहन क्षेत्रों दोनों ही इस नीति से परेशान हैं, जिससे संघर्ष की लहर उठी है।
केरल के मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशन और परिवहन मंत्री सी.पी. जॉन ने 15 जून 2026 को थिरुवनंतपुरम में 'प्रियांधर्शिनी' योजना का शुभारंभ किया, जिसका उद्देश्य राज्य‑स्वामित्व वाली बसों में महिलाओं को मुफ्त यात्रा प्रदान करना था। यह योजना चुनाव के दौरान कांग्रेस‑समर्थित सरकार की प्रमुख वादे के रूप में पेश की गई थी, परन्तु लॉन्च के एक महीने बाद ही इसे आर्थिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर गंभीर आलोचनाओं का सामना करना पड़ा।
आर्थिक अस्थिरता का मूल कारण
केरल राज्य रोड ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन (KSRTC) पहले से ही बड़े घाटे में डूबी हुई थी। वेतन, पेंशन और ईंधन बिलों के भुगतान में देरी ने कर्मचारियों को कोर्ट में ले जाया, और कुछ ने जीवन समाप्त करने तक का रास्ता चुना। 'प्रियांधर्शिनी' जैसी मुफ्त योजना ने इस तनाव को और बढ़ा दिया। अनुमानित खर्च पहले ₹2 करोड़ प्रतिदिन था, परन्तु वास्तविक खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है, जिससे KSRTC की वित्तीय स्थिति और बिगड़ रही है।
निजी बस ऑपरेटरों पर प्रभाव
केंद्रीय योजना के कारण महिलाओं का अधिकांश प्रवास सार्वजनिक KSRTC बसों की ओर हो गया, जिससे निजी बस कंपनियों की आय में गिरावट आई। कई निजी बसें सड़कों से हट गईं, जबकि अन्य ने कम यात्रियों के कारण रूट घटा दिए। यह न केवल यात्रियों के लिए विकल्प सीमित करता है, बल्कि निजी उद्यमियों के लिए आय का स्रोत भी खत्म कर रहा है। निजी ऑपरेटरों ने अब अनिश्चित हड़ताल की घोषणा की है, पर सरकार ने अभी तक कोई मुआवजा या समर्थन पैकेज नहीं दिया।
ऑटो रिक्शा चालकों की स्थिति
ऑटो रिक्शा चालक भी इस योजना से प्रभावित हुए हैं। महिलाओं का KSRTC बसों की ओर झुकाव बढ़ने से उनका रोज़गार खतरे में पड़ गया है, क्योंकि कई महिलाएं अब छोटे दूरी पर ऑटो के बजाय बस लेती हैं। यह अतिरिक्त आर्थिक तनाव राज्य के व्यापक परिवहन इकोसिस्टम को अस्थिर कर रहा है।
नीति की पुनः समीक्षा की आवश्यकता
विशेषज्ञों का मानना है कि मुफ्त यात्रा को सभी महिलाओं के लिए सार्वभौमिक रूप से लागू करने की बजाय, इसे आर्थिक रूप से सक्षम वर्गों जैसे छात्रा, बेरोज़गार युवा और सामाजिक‑आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों तक सीमित किया जाना चाहिए। भुगतान करने की क्षमता वाले यात्रियों से किराया वसूल कर योजना को स्थायी बनाया जा सकता है। वर्तमान में, सरकार ने 100 दिनों के बाद योजना की व्यवहार्यता का आकलन करने की घोषणा की है, परन्तु यह कदम योजना को मतपत्र में शामिल करने से पहले ही उठाया जाना चाहिए था।
इतिहास से सीख
इस योजना की तुलना 1996 के शराब प्रतिबंध से की जा रही है, जब तब के मुख्यमंत्री ए.के. एंटोनी ने महिलाओं के वोट को आकर्षित करने के लिए शराब पर प्रतिबंध लगाया था। वही प्रतिबंध न तो शराब की खपत में कमी लाया और न ही चुनावी लाभ दिया। 'प्रियांधर्शिनी' योजना भी इसी तरह आशा और वास्तविकता के बीच फंसी दिख रही है, जहाँ सामाजिक लाभ के नाम पर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है।