शिरोमणि अकाली दल ने ‘सतलुज’ नाम की नई फिल्म को पूरे पंजाब में दिखाने का फैसला किया, जो 1980‑1990 के उग्रता दौर में कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा की कहानी बताती है। यह कदम ज़ी5 से हटाए जाने के बाद आया और आम आदमी पार्टी की तीखी आलोचना का कारण बना।

शिरोमणि अकाली दल (SAD) ने 8 जुलाई को घोषित किया कि वह ‘सतलुज’ फिल्म को पंजाब के हर गाँव, कस्बे और शहर में दिखाएगा। इस फिल्म का मूल शीर्षक ‘Punjab ’95’ था और यह 1980‑1990 के उग्रता‑काल में पंजाब में हुई मानवीय त्रासदियों को उजागर करती है, विशेषकर मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा की कथा को।

फ़िल्म का इतिहास और विवाद

‘सतलुज’ को 3 जुलाई को ज़ी5 पर बिना कट के रिलीज़ किया गया, लेकिन केवल 48 घंटे बाद ही इसे प्लेटफ़ॉर्म से हटाया गया। हटाने के पीछे आधिकारिक कारण नहीं बताया गया, जिससे कई मीडिया विश्लेषकों ने सेंसरशिप और राजनीतिक दबाव के संकेत देखे।

SAD का रणनीतिक कदम

SAD के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बडाल ने कहा कि उन्होंने पार्टी के सभी सदस्य, कार्यकर्ता और नेता को निर्देश दिया है कि वे इस फिल्म को प्रत्येक कोने‑कोने में दिखाएँ। उनका उद्देश्य युवाओं को उस अंधेरे दौर की सच्ची कहानी से परिचित कराना और इतिहास को ‘भूलने’ से रोकना है। बडाल ने कहा, “हम इस अन्याय के गवाह नहीं बनेंगे; यह फिल्म पंजाब के दर्द को याद दिलाएगी।”

AAP की तीखी प्रतिक्रिया

आम आदमी पार्टी (AAP) ने इस कदम को “पंजाब और सिख समुदाय के खिलाफ हुए अन्यायों के साथ लगातार पक्ष लेने” का आरोप लगाया। पार्टी के पंजाब मुख्य प्रवक्ता कुंदिप सिंह ढालीवाल ने कहा कि जे. खालरा की पत्नी परमजीत कौर खालरा ने बताया कि बडाल ने मध्य सरकार को फिल्म पर प्रतिबंध लगाने के लिए पत्र लिखा था। इस आरोप ने बडाल परिवार की इमेज को और बिगाड़ा।

कानूनी और सामाजिक पहलू

फ़िल्म को हटाने के बाद कई कानूनी प्रश्न उठे। क्या यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन है, या क्या इस तरह के संवेदनशील इतिहास को सार्वजनिक मंच पर दिखाना सार्वजनिक शांति के लिए खतरा हो सकता है? विशेषज्ञों का मानना है कि इतिहास को छिपाने की बजाय खुलकर चर्चा करना सामाजिक सामंजस्य को बढ़ावा देता है।

आगे का रास्ता

सद की व्यापक स्क्रीनिंग योजना न केवल फ़िल्म को फिर से जीवंत करेगी, बल्कि पंजाब में इतिहास‑स्मृति को पुनर्स्थापित करने की कोशिश भी होगी। यदि यह पहल सफल रहती है, तो यह भविष्य में अन्य विवादित ऐतिहासिक विषयों के सार्वजनिक विमर्श के लिए एक मॉडल बन सकता है।