पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने आज एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि जलवंत सिंह खलरा हत्याकांड में कोई भी क़ैदी रिहाई का प्रॉपोज़ल राज्य सरकार या गवर्नर के पास नहीं पहुँचा है। यह बयान एएपी की ओर से लगाए गए झूठे आरोपों को निरस्त करता है।
पंजाब की सरकार ने आज अपने आधिकारिक प्रवक्ता बॉल्टेज पन्नू के माध्यम से स्पष्ट किया कि जलवंत सिंह खलरा के हत्याकांड में क़ैदी रिहाई का कोई भी प्रस्ताव मुख्यमंत्री भगवंत मान या गवर्नर के पास नहीं पहुँचा है। यह बयान उन रिपोर्टों के जवाब में आया है, जिनमें कहा गया था कि राज्य ने पूर्व डीएसपी जसपाल सिंह सहित अन्य तीन सह-आरोपियों को समय से पहले रिहा करने की सिफ़ारिश की थी।
केस की पृष्ठभूमि
जैवंत सिंह खलरा, एक मानव अधिकार कार्यकर्ता, को 1995 में पंजाब पुलिस ने मार डाला था। इस मामले की जांच के लिए 1999 में सीबीआई को नियुक्त किया गया, और 2012 में आठ आरोपियों को दोषी ठहराया गया। उनमें से चार की मृत्यु हो चुकी है, जबकि शेष चार—जसपाल सिंह, सत्नाम सिंह, सरीनदर सिंह और जस्बीर सिंह—वर्तमान में विभिन्न चरणों में बैंल या हिरासत में हैं।
एएपी का इनकार
पन्नू ने कहा कि सीबीआई‑जांच वाले मामलों में क़ैदी रिहाई का कोई भी प्रस्ताव गृह मंत्रालय (MHA) के अधिकार में आता है, न कि राज्य सरकार के। उन्होंने बताया कि जसपाल सिंह ने 2017 में पहले ही MHA से रिहाई के लिये आवेदन किया था, जिसे 2018 में अस्वीकृत कर दिया गया। उसी वर्ष गवर्नर ने भी इस प्रस्ताव को खारिज किया। 2019 में डीजीपी के सुझाव पर फिर से आवेदन किया गया, लेकिन 2023 में MHA ने इसे पुनः अस्वीकृत कर दिया।
राजनीतिक परिप्रेक्ष्य
एएपी ने यह आरोप लगाया कि शिमला अकाली दल (एसएडी) ने जानबूझकर ऐसी अफवाहें फैलाई हैं, ताकि मौजूदा सरकार की विश्वसनीयता को धूमिल किया जा सके। दल के नेता ने कई बार कहा था कि वे जलवंत खलरा के परिवार को न्याय दिलाने के लिये एक सत्य आयोग स्थापित करेंगे, लेकिन पन्नू ने कहा कि एसएडी ने इस वादे को पूरा नहीं किया।
केंद्रीय सरकार का भूमिका
पन्नू ने यह भी संकेत दिया कि बीजेजे‑नियंत्रित केंद्र सरकार ने 'सतलुज' नामक फ़िल्म को हटाने का आदेश दिया था, जो खलरा के जीवन को दर्शाती है, ताकि पंजाब के अतीत से जुड़ी सच्चाइयों को दबाया जा सके। यह टिप्पणी वर्तमान में ध्रुवीकरण की ओर इशारा करती है, जहाँ राष्ट्रीय स्तर पर भी इस मामले को राजनीतिक हथियार बनाकर इस्तेमाल किया जा रहा है।
एएपी के तथ्यानुसार, इस समय तक कोई भी रिहाई प्रस्ताव गृह मंत्रालय से वापस नहीं आया है, इसलिए न तो राज्य सरकार के पास न ही गवर्नर के पास कोई फ़ाइल मौजूद है। यह स्पष्ट करता है कि मुख्यमंत्री भगवंत मान द्वारा किसी भी रिहाई फ़ाइल पर हस्ताक्षर का दावा पूरी तरह से निराधार है।