मुंबई‑पुणे एक्सप्रेसवे के मिसिंग लिंक पर बारिश‑जनित ढलान के बाद आलोचकों को टक्कर देते हुए, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनविस ने कहा कि राज्य की छवि को धूमिल करने वाले ‘पैसे पर रखे टॉगल्स’ को सख्त सज़ा मिलेगी। इस बहस ने राजनैतिक गहराई और बुनियादी ढाँचे के प्रबंधन पर सवाल उठाए।
महाराष्ट्र के प्रमुख राजनैतिक संघर्ष का नया मोड़ तब आया जब फडनविस ने मुंबई‑पुणे एक्सप्रेसवे के ‘मिसिंग लिंक’ पर हुए बारिश‑जनित ढलान के बाद आलोचकों को कड़ी निंदा की। 18 घंटे तक बंद रहे इस हिस्से के बाद, मुख्यमंत्री ने अपनी टीम की त्वरित कार्रवाई को सराहा, पर साथ ही सोशल मीडिया पर ‘भुगतान किए गए टॉगल्स’ को निशाना बनाया।
मिसिंग लिंक का महत्व
13.3 किलोमीटर लंबा यह लिंक 94‑किलोमीटर लंबी एक्सप्रेसवे की लोनवाला‑खण्डला गेट से बचाता है, जिससे मुंबई‑पुणे यात्रा में 5.7 किलोमीटर की कटौती और 20‑30 मिनट का समय बचता है। 7000 करोड़ रुपये का यह प्रोजेक्ट कंज़र्वेटिव ‘महा योगी’ सरकार के तहत पूरा हुआ, जबकि पूर्व ‘महा विकास अघाडी’ सरकार ने इसे लगभग स्थगित कर दिया था।
आलोचना और फडनविस का जवाब
विरोधी दलों ने ढलान के बाद सुरक्षा, निर्माण गुणवत्ता और लागत पर सवाल उठाए, यह तर्क देते हुए कि यह एक लोकतांत्रिक अधिकार है। फडनविस ने कहा, "कुत्ता भी न मानेंगे" उन लोगों को जो राज्य को बदनाम करना चाहते हैं, और यह भी बताया कि ढलान से टनल और पुलों की संरचना पर कोई असर नहीं पड़ा। उन्होंने कहा कि ‘भुगतान किए गए टॉगल्स’ को ‘दोषी’ घोषित कर दिया जाए।
राजनीतिक पृष्ठभूमि
फडनविस ने कॉनकन रेलवे के शुरुआती दौर की तुलना करते हुए बताया कि बड़े बुनियादी ढाँचे परियोजनाओं में प्रारम्भिक तकनीकी चुनौतियाँ सामान्य हैं। उन्होंने यह भी बताया कि पूर्व सरकार ने 14 कारणों के साथ इस लिंक को ‘असंभव’ घोषित किया था, जिसे नई सरकार ने रद्द कर दिया।
भविष्य के लिए निहितार्थ
इस घटना से यह स्पष्ट होता है कि बुनियादी ढाँचे की परियोजनाएँ केवल इंजीनियरिंग नहीं, बल्कि राजनीतिक युद्धक्षेत्र भी हैं। फडनविस का दावा कि इतिहास उनके और शिंदे के नाम को याद रखेगा, पर विपक्ष ने यह कहा कि सरकारी जवाबदेही को ‘समीक्षा’ के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। यह बहस यह दर्शाती है कि कैसे राज्य की प्रतिष्ठा और व्यक्तिगत प्रतिष्ठा को अलग‑अलग तरीके से देखा जाता है।