पूर्व दिल्ली मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने केंद्र सरकार पर तेल कंपनियों को अवैध लाभ पहुँचाने का आरोप लगाया और पेट्रोल की कीमत 102 रुपये से घटाकर 82 रुपये करने की माँग की। उन्होंने वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट के बावजूद कीमतों को स्थिर रखने पर सवाल उठाया और ई20 इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल के प्रभाव पर भी चिंता जताई।
केंद्रीय सरकार पर तेल कंपनियों को अवैध लाभ पहुँचाने का आरोप लगाते हुए पूर्व दिल्ली मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 9 जुलाई को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपने तर्क प्रस्तुत किए। उन्होंने बताया कि वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें फरवरी में लगभग 70 डॉलर से घटकर 55 डॉलर के आसपास हो गई हैं, जबकि भारत सरकार द्वारा तय की गई पेट्रोल की कीमत 102 रुपये प्रति लीटर पर अडिग रही है।
केंद्रीय नीति पर आलोचना
केंद्रीय सरकार द्वारा तय पेट्रोल की कीमत को ‘राष्ट्र के हित में’ बताया गया, पर केजरीवाल का मानना है कि इस नीति से तेल कंपनियाँ ‘अनधिकृत लाभ’ कमा रही हैं। उन्होंने कहा, "पेट्रोल की कीमत 102 रुपये से घटकर 82 रुपये होनी चाहिए," यह कहते हुए कि वर्तमान मूल्य उपभोक्ताओं के लिए बोझिल है।
ई20 इथेनॉल और उपभोक्ता प्रभाव
केंद्रीय सरकार की हालिया पहल के तहत 20% इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (ई20) को बढ़ावा दिया गया है। केजरीवाल ने इस कदम पर सवाल उठाया, यह पूछते हुए कि ई20 मिश्रण से इंजन की दक्षता पर क्या असर पड़ेगा और उपभोक्ताओं को इससे किस प्रकार का आर्थिक बोझ उठाना पड़ेगा। उन्होंने ऑटोमेकर्स से स्पष्ट जवाब देने की मांग की।
ऑटोमेकर्स से जवाबदेही की मांग
पिछले दिन केजरीवाल ने 29 प्रमुख ऑटोमेकर्स को लिखित पत्र भेजे, जिसमें उन्होंने ई20 पेट्रोल के प्रभाव पर विस्तृत जानकारी माँगी। पत्र में 7 दिनों के भीतर जवाब देने का निर्देश दिया गया। मारुति सुज़ुकी, टोयोटा, और हीरो मोटोकॉर्प को अलग-अलग पत्र भेजे गए, जबकि अन्य 26 कंपनियों को एक समेकित पत्र भेजा गया।
राजनीतिक और आर्थिक असर
यह कदम न केवल तेल उद्योग की लाभप्रदता पर सवाल उठाता है, बल्कि ऊर्जा नीति के व्यापक ढांचे पर भी प्रकाश डालता है। यदि सरकार ई20 मिश्रण को बढ़ावा देती रहती है, तो उपभोक्ताओं को दीर्घकालिक रूप से लाभ मिल सकता है, परंतु तत्काल लागत बढ़ने की संभावना भी बनी रहती है। केजरीवाल की आलोचना से यह स्पष्ट होता है कि ऊर्जा नीतियों को पारदर्शी और उपभोक्ता-केंद्रित बनाना आवश्यक है।
इस घटना से यह भी स्पष्ट होता है कि तेल कंपनियों और सरकार के बीच लाभ साझा करने के मॉडल को पुनर्विचार की आवश्यकता है, ताकि उपभोक्ताओं को अनावश्यक बोझ से मुक्त किया जा सके और ऊर्जा क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दिया जा सके।