एरोड़े जिले के वन सीमा के पास स्थित सेंदरायनपालायम बस्ती में लगभग 100 पुनर्वासित परिवारों को अभी भी बिजली, साफ़ पानी और मोटर योग्य सड़कों जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित रखा गया है। प्रशासनिक अड़चनें और वन के निकटता से जंगली जानवरों का खतरा उनके दैनिक जीवन को और कठिन बना रहा है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • 100 परिवारों को बुनियादी सुविधाओं से वंचित
  • बिजली और जल आपूर्ति के लिए भूमि पट्टे आवश्यक
  • वन के निकटता से जंगली जानवरों का खतरा बढ़ा

एरोड़े जिले के गोबिचेट्टिपालयम तहसील में स्थित सेन्द्रायनपालायम नामक बस्ती, जो तमिलनाडु के टी.एन. पालयम वन रेंज की सीमा के बहुत करीब है, लगभग छह साल पहले पुनर्वासित 100 से अधिक परिवारों का नया घर बना। ये परिवार मुख्यतः कृषि श्रमिक और दैनिक मजदूर थे, जिन्होंने अपने पूर्व आवासीय क्षेत्रों से इस स्थान पर स्थानांतरित होकर अस्थायी झोपड़ियों में रहना शुरू किया।

पुनर्वास का उद्देश्य और वास्तविकता

सरकार ने इन परिवारों को वन के किनारे स्थित माथेस्वरन मंदिर के पास बसाने का वादा किया था, जिससे उन्हें भूमि‑आधारित आय और बेहतर सामाजिक सेवाएँ मिलेंगी। लेकिन वास्तविकता में, बस्ती को अभी तक कोई औपचारिक भूमि पट्टा (पट्टा) नहीं मिला है, जिससे बिजली वितरण कंपनी TNPDCL और जल विभाग दोनों ही बुनियादी सुविधाओं की आपूर्ति से इनकार कर रहे हैं।

बुनियादी सेवाओं की कमी

बस्ती में अभी भी बिना बिजली के रहने वाले घर, कोई पाइप्ड ड्रिंकिंग वाटर सप्लाई नहीं, मोटर योग्य सड़कों की अनुपस्थिति और सार्वजनिक परिवहन की कमी है। निवासियों ने कई बार तहसील और जिला प्रशासन को लिखित याचिकाएँ दीं, पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। इस कारण, कई परिवार प्लास्टिक टैंकों में लायी गई पानी पर निर्भर हैं, जो स्वास्थ्य जोखिम को बढ़ाता है।

वन के निकटता से उत्पन्न सुरक्षा चिंताएँ

बिना प्रकाश के रात में बस्ती के लोग बाहर निकलने से डरते हैं, क्योंकि वन के करीब होने के कारण जंगली जानवरों—विशेषकर विषैले साँप—का खतरा बढ़ गया है। महिलाएँ और बुजुर्ग विशेष रूप से असुरक्षित महसूस करते हैं, क्योंकि बस सेवा का अभाव उन्हें स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुँचने से रोकता है।

हालिया प्रशासनिक प्रतिक्रिया और आगे का मार्ग

हाल ही में राजस्व विभाग के अधिकारी बस्ती का दौरा कर आए और आश्वासन दिया कि पट्टे जारी करने और बिजली‑पानी की आपूर्ति के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि बुनियादी सुविधाओं की देर से आपूर्ति न केवल मानवाधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि वन-मानव संघर्ष को भी उत्प्रेरित कर सकती है। तत्काल कार्रवाई न होने पर इस बस्ती की स्थिति राष्ट्रीय स्तर पर सामाजिक न्याय के मुद्दे के रूप में उभर सकती है।