कर्नाटक हाई कोर्ट ने 27 मई को कांग्रेस सरकार के 52 आपराधिक मामलों को निरस्त करने के आदेश को स्थगित कर दिया। अदालत ने कहा कि राज्य की ओर से मामलों को बंद करना सार्वजनिक अभियोजक के अधिकार का उल्लंघन है। यह निर्णय राजनीतिक रूप से प्रेरित केस ड्रॉप की प्रवृत्ति को चुनौती देता है।

बेंगलुरु – कर्नाटक हाई कोर्ट ने कांग्रेस‑सिद्धरामैया सरकार के 27 मई के आदेश को रोकते हुए 52 आपराधिक मामलों को निरस्त करने की योजना को अस्थायी रूप से निलंबित कर दिया। यह फैसला एक विस्तृत याचिका के बाद आया, जिसमें दायें‑पंथी कार्यकर्ता गिरिश भरद्वाज ने राज्य‑स्तरीय केस ड्रॉप को असंवैधानिक बताया।

राजनीतिक पृष्ठभूमि और पूर्व उदाहरण

सिद्धरामैया के कार्यकाल के अंत में यह कदम, कांग्रेस और भाजपा दोनों के शासकों द्वारा अपने समर्थन आधार के खिलाफ चलाए गए समान कदमों की श्रृंखला में नया है। 2013‑18 में कांग्रेस ने 176 मामलों को, जिसमें लोकप्रिय फ्रंट ऑफ़ इंडिया (PFI) के कार्यकर्ता, किसान, दलित और प्रो‑कन्नड़ समूह शामिल थे, निरस्त किया था। 2019‑2023 के बीच भाजपा ने 385 मामलों को हटाया, जिनमें हिंदु जागरना वेदिके और अन्य हिन्दुत्व‑सम्बंधी संगठनों के सदस्य शामिल थे।

विचाराधीन 52 मामले

भारतीय एक्सप्रेस द्वारा किए गए विश्लेषण के अनुसार, इन 52 मामलों में शामिल हैं:

  • कुल 8 मामलों में 2022 के कालबुर्गी (अलंद) में हुए communal दंगे, जहाँ 300 से अधिक मुस्लिमों को FIR दर्ज हुई थी;
  • 2016 के बेंगलुरु में प्रो‑कन्नड़ आंदोलन से जुड़े 10 मामले;
  • भ्रष्टाचार‑संबंधी 5 दलित समूहों के विरोध;
  • किसान आंदोलन से जुड़े 12 मामले;
  • 2020‑21 के कोविड प्रोटोकॉल उल्लंघन के मामलों और अन्य मामूली केस।
इनमें से केवल एक मामला, जो 2023 में कन्नड़ रक्षना वेदिके के बैनर फाड़ने से जुड़ा था, को अदालत ने बंद कर दिया।

अदालत का कानूनी तर्क

हाई कोर्ट ने 29 मई 2025 के अपने पूर्व आदेश को उद्धृत करते हुए कहा कि आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 321 के तहत अभियोजन का अधिकार सार्वजनिक अभियोजक के पास है, न कि राज्य सरकार के पास। इसलिए, राज्य द्वारा “चयनात्मक” मामलों को बंद करने का आदेश विधिक रूप से अमान्य है। मुख्य न्यायाधीश विव्हु बखरु और जस्टिस के.एस. हेमा लेखा ने इस बात पर बल दिया कि न्यायिक निरीक्षण के बिना कार्यकारी आदेश न्यायिक प्रक्रिया को कमजोर कर सकते हैं।

राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव

इस निर्णय से दो प्रमुख प्रभाव स्पष्ट होते हैं: (1) भविष्य में किसी भी सरकार के लिये राजनीतिक आधार को सुरक्षित करने हेतु आपराधिक मामलों को हटाने की रणनीति को कानूनी बाधाओं का सामना करना पड़ेगा; (2) यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता को सुदृढ़ करता है, जिससे सार्वजनिक भरोसा बढ़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि राजनीतिक दल इस मार्ग पर अड़े रहे तो सामाजिक तनाव और समुदाय‑आधारित विभाजन की संभावना बढ़ेगी।

आगे का रास्ता

राज्य गृह मंत्री प्रियांक खरगे ने कहा कि सरकार हाई कोर्ट के आदेश की कानूनी प्रतिक्रिया तैयार कर रही है। इस बीच, विपक्षी दल और नागरिक समाज समूह इस मामले को संवैधानिक न्यायालय में ले जाने की संभावना पर चर्चा कर रहे हैं।