मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता केवल प्रक्रिया में मददगार होनी चाहिए, न कि न्याय देने में। उन्होंने न्यायिक प्रणाली में AI के दुरुपयोग को रोकने के लिए क़ानूनी स्पष्टता और मानव निगरानी की मांग की।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- AI को केवल सहायक भूमिका में उपयोग किया जाना चाहिए।
- क़ानूनी स्पष्टता और मानवीय निगरानी आवश्यक है।
- गलत AI‑निर्णयों से न्यायिक प्रक्रिया को खतरा हो सकता है।
नई दिल्ली (११ जुलाई, २०२६) – भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने आज एक मंच पर स्पष्ट किया कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) न्यायिक प्रक्रिया में केवल “सहायता” के लिए प्रयुक्त होनी चाहिए, निर्णय‑निर्धारण के लिए नहीं। यह बयान राष्ट्रीय स्तर पर तकनीकी‑क़ानूनी बहस को नई दिशा देगा।
पृष्ठभूमि और हालिया घटनाक्रम
पिछले महीने, एक ट्रिब्यूनल ने AI‑जनित “हैलुसिनेशन” वाले फैसलों पर भरोसा किया, जिससे वास्तविक मुकदमे में त्रुटि आई। सुप्रीम कोर्ट ने इस घटना को “शून्य‑सहनशीलता” की नीति के तहत उजागर किया, क्योंकि मशीन‑बुद्धि पर अंधविश्वास न्यायिक प्रक्रिया को नष्ट कर सकता है। इसी तरह न्यायाधीश बी.वी. नगरथना और दीपंकर दत्ता ने भी खुलकर कहा कि उन्होंने याचिकाओं में काल्पनिक मामलों और गलत संदर्भों को देखा है, जैसे ‘Mercy versus Mankind’ नामक एक बिन‑अस्तित्व वाली केस‑लॉ।
सूर्यकांत का मुख्य तर्क
सीजेआई ने कहा कि प्रश्न यह नहीं है कि भारत को AI अपनाना चाहिए या नहीं, बल्कि यह है कि किस तरह की “विधायी स्पष्टता” और “मानवीय निगरानी” लागू की जाए। उन्होंने कहा, “अभियोजन का कार्य पहले से ही शुरू हो चुका है; इसे रोकना व्यावहारिक नहीं है। हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ये प्लेटफ़ॉर्म न्याय तक पहुँच को विस्तारित करें, न कि सीमित।”
AI की सीमाएँ और संभावित उपयोग
सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि AI “विवाद को ट्रायेज़ कर सकता है, साक्ष्य व्यवस्थित कर सकता है, या पहला अनुवाद तैयार कर सकता है”, परन्तु “जब वह दो पक्षों के अधिकारों को तुलनात्मक रूप से तौलता है, तो वह सहायक से निर्णायक बन जाता है, जो कि अभी तक किसी एल्गोरिदम के लिए स्वीकार्य नहीं है।” उन्होंने कहा कि वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में AI का उपयोग केवल कानूनी शोध, केस‑सारांश और भाषा‑अनुवाद में ही सीमित है।
भविष्य की राह
न्यायिक संस्थानों के लिए यह चुनौती है कि वे AI को ‘सहायता‑उन्मुख’ रखे और ‘निर्णय‑उन्मुख’ नहीं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि उचित नियमावली, पारदर्शी डेटा स्रोत, और निरंतर मानवीय समीक्षा लागू की जाए तो AI न्याय तक पहुँच को तेज़ और अधिक सुलभ बना सकता है। अन्य देशों में भी समान बहस चल रही है, जहाँ यूरोपीय संघ ने AI‑सहायता के लिए कठोर नैतिक ढाँचा तैयार किया है। भारत को इस दिशा में कदम बढ़ाने में शीघ्रता और सावधानी दोनों की आवश्यकता है।