कांग्रेस ने आयोध्या में राम मंदिर के दान प्रबंधन में गंभीर irregularities का आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट‑निगरानी जांच की मांग की। पार्टी का दावा है कि यह वित्तीय धोखाधड़ी भक्तों के विश्वास को भी धूमिल करती है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- कांग्रेस ने आयोध्या राम मंदिर में दान के लेन‑देन को लेकर सुप्रीम कोर्ट‑निगरानी जांच की माँग की।
- पार्टी का कहना है कि यह मामला सिर्फ वित्तीय नहीं, बल्कि भक्तों के विश्वास का भी उल्लंघन है।
- वर्तमान ट्रस्ट को तोड़ कर पारदर्शी एवं जवाबदेह निकाय की स्थापना की भी माँग की गई।
जयपुर – भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने शनिवार को आयोध्या के राम मंदिर में दान संग्रह प्रणाली में “भ्रष्टाचार” का आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट‑निगरानी में एक न्यायिक जांच की माँग की। पार्टी के प्रवक्ता अजय उपाध्याय ने इसे “विश्वास के नाम पर लूट” कहा, यह संकेत देते हुए कि यह केवल वित्तीय धोखा नहीं, बल्कि करोड़ों भक्तों के आस्था‑विश्वास का गंभीर उल्लंघन है।
पार्टी का आधिकारिक बयान
उपाध्याय ने कहा, “भगवान राम के नाम पर एकत्र किए गए फंड को बीजेपी‑आरएसएस ने राजनीतिक लाभ के लिये उपयोग किया है।” उन्होंने यह भी कहा कि राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के जनरल सचिव चम्पत राय और ट्रस्टी अनिल मिश्रा ने इस विवाद के बाद पद त्याग दिया, जो पारदर्शिता की कमी का प्रमाण है। कांग्रेस का तर्क है कि यदि सब कुछ ठीक होता, तो इतनी बड़ी जिम्मेदारी वाले पदों से क्यों इस्तीफा दिया गया?
वर्तमान जांच की पृष्ठभूमि
जून 7 को समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने दान के हेरफेर का आरोप लगाया, जिसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने एक तीन‑सदस्यीय विशेष जांच टीम (SIT) गठित की। प्रारंभिक रिपोर्ट के अनुसार, मंदिर में दान के रूप में प्राप्त नकद और कीमती वस्तुओं की गिनती में जुड़ने वाले आठ लोगों को गिरफ्तार किया गया। इस दौरान ट्रस्ट के जनरल सचिव ने कहा कि “आंतरिक ऑडिट में कोई उल्लेखनीय irregularities नहीं मिलीं”, परन्तु सार्वजनिक दबाव ने उन्हें इस्तीफा देने पर मजबूर किया।
कांग्रेस की आगामी माँगे
कांग्रेस ने वर्तमान ट्रस्ट को विघटित कर एक नई, पूरी तरह पारदर्शी और जवाबदेह निकाय की स्थापना की माँग की है। उन्होंने यह भी कहा कि “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस मामले में मौन नहीं रखना चाहिए” और “सुप्रीम कोर्ट‑निगरानी जांच से ही सत्य सामने आएगा”। पार्टी ने यह स्पष्ट किया कि “भगवान राम किसी भी राजनीतिक दल के स्वामित्व में नहीं हैं, वे करोड़ों भारतीयों के विश्वास का प्रतीक हैं।”
यदि सुप्रीम कोर्ट इस मांग को स्वीकार करता है, तो यह भारत के सबसे संवेदनशील धार्मिक स्थल में सार्वजनिक धन की पारदर्शिता के एक महत्वपूर्ण precedent स्थापित कर सकता है, जिससे भविष्य में समान विवादों को रोकने में मदद मिलेगी।