त्रिवेंद्रम में आयोजित सार्वजनिक समारोह में मंत्री के.एम. शाजी ने निलाविलक्कु जलाया, जबकि पी.के. कुन्हालिकुट्टी ने इसे नहीं किया, जिससे भारतीय यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) के भीतर दीप प्रज्वलन को लेकर दीर्घकालिक बहस फिर से उभरी। पूर्व मुस्लिम यूथ लीग नेता के.टी. जलील ने इस विरोधाभास पर तीखा सवाल किया।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • त्रिवेंद्रम में दो IUML मंत्रियों के दीप प्रज्वलन के अलग-अलग व्यवहार ने पार्टी के भीतर गहरी विभाजन को उजागर किया।
  • जलील ने कहा, ‘एक के लिए हराम, दूसरे के लिए हलाल’, जिससे धार्मिक और सांस्कृतिक व्याख्याओं पर नया विमर्श शुरू हुआ।
  • यह मुद्दा IUML के युवा वर्ग और पारंपरिक उलेमा दोनों के बीच पीढ़ीगत टकराव को दर्शाता है।

केरल की राजधानी त्रिवेंद्रम में 9 जुलाई को आयोजित सार्वजनिक समारोह में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) के दो प्रमुख मंत्री—उद्योग मंत्री पी.के. कुन्हालिकुट्टी और स्थानीय स्व-शासन मंत्री के.एम. शाजी—की अलग-अलग प्रतिक्रियाओं ने पार्टी के भीतर दीप प्रज्वलन को लेकर चल रहे विवाद को फिर से गर्म किया। शाजी ने पारंपरिक निलाविलक्कु जलाया, जबकि कुन्हालिकुट्टी ने अपने हाथ से दीप नहीं जलाया, बल्कि इसे अन्य मान्यवरों को सौंप दिया।

पृष्ठभूमि

दीप प्रज्वलन का अभ्यास केरल में कई दशकों से सामाजिक समारोहों का अभिन्न हिस्सा रहा है, परन्तु इसका धार्मिक अर्थ लेकर IUML के भीतर मतभेद उत्पन्न हुए हैं। कुछ वर्ग इसे हिंदू धार्मिक अनुष्ठान मानते हुए इसको इस्लामी सिद्धान्तों के विरुद्ध देखते हैं, जबकि अन्य इसे बहु-सांस्कृतिक समाज में एक सांस्कृतिक रीति मानते हैं, जिसका कोई धार्मिक पहलू नहीं।

विवाद का इतिहास

यह विवाद 2015 तक पहुँचता है, जब तब के शिक्षा मंत्री पी.के. अब्दु रब्ब ने दीप नहीं जलाने के पक्ष में स्पष्ट बयान दिया था। उसी समय वरिष्ठ नेता ई.टी. मोहम्मद बशीर ने भी इस रुख को समर्थन दिया। इसके विपरीत, एम.के. मुनीर और शाजी जैसे नेताओं ने कहा कि IUML के पास इस मुद्दे पर कोई आधिकारिक नीति नहीं है, और व्यक्तिगत विवेक पर निर्भर होना चाहिए।

नवीनतम घटना

जलील ने सार्वजनिक रूप से इस असंगति पर प्रश्न उठाते हुए कहा, “दोनों एक ही धर्म के अनुयायी हैं, फिर दीप एक के लिए हराम और दूसरे के लिए हलाल कैसे हो सकता है?” उनका यह बयान सोशल मीडिया पर तेजी से फैल गया, जहाँ कई मुस्लिम विद्वानों ने शाजी के कार्य को ‘सांस्कृतिक’ और ‘धार्मिक नहीं’ मानते हुए समर्थन किया, जबकि समस्त मुस्लिम उलेमा संगठनों ने इसे ‘इस्लाम के विरुद्ध’ कहा।

भविष्य की संभावनाएँ

विश्लेषकों का मानना है कि यह विभाजन IUML के भीतर एक व्यापक जनसांख्यिकीय परिवर्तन का संकेत है—जहां युवा नेता अधिक सेक्युलर और समावेशी छवि प्रस्तुत करना चाहते हैं, जबकि पारंपरिक उलेमा वर्ग धार्मिक शुद्धता को प्राथमिकता देते हैं। यदि यह द्वंद्व जारी रहा, तो पार्टी को आगामी चुनावों में अपने वोट बेस को संतुलित करने में कठिनाई हो सकती है।

समग्र रूप से, दीप प्रज्वलन का मुद्दा केवल एक प्रतीकात्मक क्रिया नहीं, बल्कि धार्मिक पहचान, सांस्कृतिक सहिष्णुता और राजनीतिक रणनीति के बीच जटिल अंतःक्रिया को प्रतिबिंबित करता है।