जम्मू और कश्मीर तथा लद्दाख हाई कोर्ट ने कहा कि मातृ अवकाश महिलाओं की गरिमा का अभिन्न हिस्सा है, न कि राज्य की दानशीलता। इस फैसले ने सरकार के वेतन रोक आदेश को निरस्त कर सभी महिला डॉक्टरों को पूर्ण वेतन व भत्ते दिलवाए।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • मातृ अवकाश को संवैधानिक अधिकार माना गया, दान नहीं।
  • सरकारी आदेश जो वेतन रोकता था, उसे कोर्ट ने रद्द कर दिया।
  • भविष्य में सभी महिला कर्मचारियों को समान अधिकार मिलेंगे।

जम्मू और कश्मीर तथा लद्दाख के उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक निर्णय में स्पष्ट किया कि मातृ अवकाश केवल सामाजिक सौजन्य नहीं, बल्कि महिलाओं की गरिमा पर आधारित एक अटल संवैधानिक अधिकार है। यह निर्णय न केवल स्वास्थ्य क्षेत्र में कार्यरत महिला डॉक्टरों के लिए, बल्कि सभी सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र की महिला कर्मचारियों के लिए एक दिशा-निर्देश स्थापित करता है।

पृष्ठभूमि

भारत में मातृ अवकाश के अधिकार को 1990 के दशक में विभिन्न राज्य‑स्तर के नियमों के माध्यम से मान्यता मिली, परन्तु वेतन की गारंटी अक्सर अस्पष्ट रही। 2024 में जम्मू‑कश्मीर सरकार ने वरिष्ठ रेजिडेंट और ट्यूटर डॉक्टरों को विस्तारित मातृ अवकाश प्रदान करने का आदेश जारी किया, परन्तु 2025 में एक प्रशासनिक संचार ने कहा कि वे “असाइनमेंट से बाहर” होने के कारण उनका वेतन रोका जाएगा। इस असंगति ने कई महिला डॉक्टरों को अदालत में ले जाया।

केस की बारीकियाँ

डॉ. सोनाक्षी गुप्ता सहित कई वरिष्ठ रेजिडेंट और ट्यूटर ने न्यायालय में याचिका दायर की, जिसमें उन्होंने कहा कि 8 जुलाई 2024 के सरकारी आदेश ने स्पष्ट रूप से मातृ अवकाश के साथ वेतन एवं भत्ते भी शामिल किए थे। वकीलों ने यह तर्क दिया कि मौजूदा सेवा नियमों में भुगतान योग्य मातृ अवकाश का प्रावधान है, इसलिए प्रशासन का वेतन रोकना वैध नहीं है। उत्तर प्रदेश प्रशासन ने तर्क दिया कि ये डॉक्टर 2020 के अकादमिक एरेंजमेंट नियमों के तहत टेन्योर‑बेस्ड नियुक्ति हैं, न कि नियमित सरकारी कर्मचारी, इसलिए उन्हें वेतन नहीं मिलना चाहिए।

न्यायिक तर्क

जज राजनेश ओसवाल ने स्पष्ट किया कि "मातृ अवकाश को राज्य की चैरिटी नहीं, बल्कि महिलाओं की गरिमा पर आधारित संवैधानिक अधिकार माना जाना चाहिए"। उन्होंने कहा कि वेतन व भत्ते मातृ अवकाश का अभिन्न हिस्सा हैं और किसी भी कार्यकारी आदेश द्वारा इसे घटाया नहीं जा सकता। इस प्रकार, 14 अक्टूबर 2025 के संचार को निरस्त कर जम्मू‑कश्मीर प्रशासन को आदेश दिया गया कि वे सभी महिला डॉक्टरों को पूर्ण वेतन एवं भत्ते जारी करें।

भविष्य के प्रभाव

यह निर्णय न केवल जम्मू‑कश्मीर में, बल्कि पूरे भारत में समान मामलों में न्यायिक मार्गदर्शन प्रदान करेगा। यह स्पष्ट करता है कि राज्य के किसी भी प्रशासनिक आदेश को संवैधानिक अधिकारों के विरुद्ध नहीं रखा जा सकता। विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से निजी क्षेत्र में भी मातृ अवकाश के भुगतान संबंधी नीतियों में सुधार की उम्मीद है, जिससे कार्यस्थल पर लैंगिक समानता को बल मिलेगा।

समग्र रूप से, यह न्यायिक निर्णय महिलाओं के कार्यस्थल अधिकारों को सुदृढ़ करने के लिए एक मील का पत्थर है और भविष्य में समान मामलों में न्यायालयों की रुख को भी स्पष्ट करता है।