मोहाली के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने लकी पैटियल गैंग के दो संदिग्धों, गुरदीप सिंह (गिल) और गुरप्रीत सिंह (कुक्की) को ₹1 करोड़ की एक्सटॉर्शन व घर के बाहर गोलीबारी के आरोप में जमानत नहीं दी। अदालत ने अपराध की सामाजिक प्रभाव और अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन को देखते हुए कड़ी सजा की सिफारिश की।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • मोहाली कोर्ट ने दो आरोपियों को जमानत नहीं दी।
  • केस में ₹1 करोड़ की एक्सटॉर्शन और घर के बाहर गोलीबारी शामिल है।
  • अभियोजन ने गैंग के अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन को उजागर किया।

मोहाली के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने दो संभावित लकी पैटियल गैंग सदस्यों, गुरदीप सिंह (उपनाम गिल) और गुरप्रीत सिंह (उपनाम कुक्की), के जमानत आवेदन को खारिज कर दिया। यह निर्णय एक गंभीर मामले के संदर्भ में आया है, जिसमें ₹1 करोड़ की एक्सटॉर्शन की माँग और एक संपत्ति डीलर के घर के बाहर गोलीबारी शामिल है।

केस की पृष्ठभूमि

फिर्याद में बताया गया कि अनजान हमलावरों ने संपत्ति डीलर जस्वीर सिंह के घर के बाहर गोलियाँ चलाईं, जबकि उसकी पत्नी तरनजित कौर ने पुलिस को रिपोर्ट की। सीसीटीवी फुटेज में दो मोटरसाइकिल सवार युवाओं को हमले के दौरान दिखाया गया। आगे जांच में पता चला कि जस्वीर सिंह को रोमानिया से एक अंतरराष्ट्रीय कॉल आया, जिसमें कॉल करने वाले ने खुद को “लकी पैटियल” बताया और ₹1 करोड़ की एक्सटॉर्शन की माँग की।

क़ानूनी तर्क

रक्षा पक्ष का तर्क था कि आरोपियों का नाम मूल FIR में नहीं लिखा गया था और उन्हें 1 अप्रैल 2026 से न्यायिक हिरासत में रखा गया है, इसलिए जमानत देना उचित नहीं होगा। उन्होंने यह भी कहा कि सीधे तौर पर कोई सबूत नहीं है जो उन्हें इस अपराध से जोड़ता हो।

प्रोसेक्यूशन ने प्रतिपादित किया कि दोनों आरोपी लकी पैटियल गैंग से जुड़े हैं और विदेशी गैंगस्टरों के आदेश पर अपराध किए थे। उन्होंने यह भी कहा कि निरोधात्मक उपायों के अभाव में भविष्य में समान अपराधों की संभावना बनी रहती है।

न्यायालय की विचारधारा

जज ने यह रुख अपनाया कि एक्सटॉर्शन और गोलीबारी जैसी गंभीर अपराधों से समाज में भय और असुरक्षा का माहौल बनता है, इसलिए कड़ी सजा आवश्यक है। उन्होंने यह भी नोट किया कि दोनों accused अन्य आपराधिक मामलों में भी शामिल हैं, जिससे बंधक जारी रहने पर पुनः अपराध करने की संभावना अधिक है।

भविष्य के प्रभाव

जमानत अस्वीकृति न केवल इस मामले में तत्काल न्याय सुनिश्चित करती है, बल्कि भारत में अंतरराष्ट्रीय गैंग‑प्रेरित अपराधों के खिलाफ कड़ी नीति का संकेत भी देती है। यह निर्णय भविष्य में समान मामलों में न्यायिक दृष्टिकोण को सुदृढ़ कर सकता है, जिससे संगठित अपराध के खिलाफ कार्रवाई में तेजी आ सकती है।