कर्नाटक के नागरिक वोट वैजिलेंस कमेटी ने चुनाव आयोग से विशेष इंटेंसिव रीविजन (SIR) को कम से कम छह महीने तक बढ़ाने की मांग की है, क्योंकि बूथ‑लेवल ऑफिसरों (BLO) पर अत्यधिक काम का बोझ है। समूह ने मौजूदा वार्षिक भत्ता को भी अपर्याप्त बताया।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • कर्नाटक में SIR का विस्तार छह महीने तक करने की अनुरोध.
  • BLOs को प्रशिक्षण और योजना की कमी के कारण भारी कार्यभार.
  • वार्षिक ₹12,000 के भत्ते को बढ़ाने की मांग.

कर्नाटक में चल रहे विशेष इंटेंसिव रीविजन (SIR) प्रक्रिया को लेकर नागरिक वोट वैजिलेंस कमेटी ने चुनाव आयोग को आधा वर्ष का विस्तार देने का औपचारिक अनुरोध किया है। यह समूह, जो मतदाता और बूथ‑लेवल ऑफिसरों (BLO) की सहायता के लिए गठित है, का तर्क है कि वर्तमान समय‑सीमा BLOs पर अत्यधिक दबाव डाल रही है, जिससे सार्वजनिक संवाद में तनाव बढ़ रहा है।

पृष्ठभूमि और SIR का महत्व

SIR, या विशेष इंटेंसिव रीविजन, भारतीय चुनावों में मतदाता सूची को शुद्ध करने और नवीनतम जनसंख्या डेटा को सम्मिलित करने के लिए एक तीव्र चरण है। यह चरण आमतौर पर सीमित समय में पूरा किया जाता है, जिससे मैदान में कार्यरत अधिकारियों को बड़ी मात्रा में घर‑घर जाकर जानकारी सत्यापित करनी पड़ती है। कर्नाटक में इस चरण की शुरुआत 2026 की मध्य‑शरद ऋतु में हुई, लेकिन कई क्षेत्रों में तैयारी और प्रशिक्षण की कमी के कारण समस्याएँ उत्पन्न हुईं।

बूथ‑लेवल ऑफिसरों (BLO) पर बढ़ता बोझ

कमेटी ने बताया कि BLOs को पर्याप्त प्रशिक्षण, स्पष्ट कार्य‑प्रणाली या उचित संसाधन नहीं मिले, जिससे उन्हें नागरिकों के साथ बार‑बार विवादों का सामना करना पड़ता है। इस प्रक्रिया में, कई नागरिकों ने अपने दस्तावेज़ों की पुष्टि के दौरान कठिनाइयों की शिकायत की, जबकि BLOs को अनिश्चित समय सीमा में बड़े पैमाने पर डेटा एकत्रित करना पड़ता है। इसके परिणामस्वरूप, कार्यस्थल के तनाव में वृद्धि और संभावित त्रुटियों की संभावना बढ़ी है।

आर्थिक एवं नैतिक माँगें

समूह ने चुनाव आयोग को “नैतिक रूप से जिम्मेदार” कहा, क्योंकि उन्होंने कहा कि वर्तमान वार्षिक भत्ता ₹12,000 BLOs की अतिरिक्त जिम्मेदारियों को कवर नहीं करता। इसलिए, उन्होंने एक विशेष भत्ते की मांग की, जो अतिरिक्त कार्यभार और संभावित जोखिमों को ध्यान में रखकर तय किया जाए। यह माँग न केवल आर्थिक न्याय की वकालत करती है, बल्कि सार्वजनिक विश्वास को भी सुदृढ़ करने का लक्ष्य रखती है।

भविष्य की संभावनाएँ और प्रभाव

यदि चुनाव आयोग इस विस्तार को मंजूरी देता है, तो यह कर्नाटक में SIR प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित बनाने, त्रुटियों को घटाने और नागरिक‑BLO संवाद को सहज बनाने में सहायक हो सकता है। दूसरी ओर, बिना विस्तार के जारी रहने वाली प्रक्रिया असंतोष को बढ़ा सकती है और चुनावी परिणामों की वैधता पर प्रश्नचिन्ह लगा सकती है। इस विवाद का समाधान कर्नाटक के चुनावी ढाँचे की विश्वसनीयता के लिए निर्णायक होगा।