आरोहण पर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने संध्या‑कंद पाठ के बाद BJP को धर्म के नाम पर वोट पाने का आरोप लगाया। उन्होंने दान चोरी के आरोपियों को फांसी की सजा देने का आश्वासन दिया, जबकि भाजपा ने इस आयोजन को राजनैतिक तमाशा कहा।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- केजरीवाल ने संध्या‑कंद पाठ कर दान चोरी के आरोपियों को फांसी की सजा देने का वचन दिया।
- BJP ने इस कदम को ‘राजनीतिक हिन्दू’ का तमाशा कहा, धर्म को चुनावी हथियार बनाने पर आरोप लगाया।
- राम मंदिर दान विवाद ने राष्ट्रीय राजनीति में नई तीव्रता पैदा कर दी, दोनों पक्षों के बीच विवाद तीव्र रहा।
दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने रविवार को रोहिणी के जापानी पार्क में आयोजित संध्या‑कंद पाठ के बाद भाजपा को तीखा जवाब दिया। उन्होंने यह कहा कि जो लोग संध्या‑कंद का पाठ विरोध करते हैं, वे “दैवीय प्रवृत्तियों” वाले हैं, और राम मंदिर में हुए दान चोरी के लिए जिम्मेदार लोगों को फांसी की सजा तक नहीं रुकेंगे।
पृष्ठभूमि और विवाद का स्रोत
अयोध्या के राम मंदिर को 2020 में पूर्णता के करीब माना गया था, लेकिन दान की गड़बड़ी के आरोपों ने पार्टी‑गतिज़्म को नई दिशा दी। कई एएपी नेताओं ने बताया कि 2023‑24 में दान संग्रह के रिकॉर्ड में अनियमितताएँ पाई गईं, जिससे विपक्षी दलों ने इस मुद्दे को सार्वजनिक किया। केजरीवाल ने इस मुद्दे को अपने आध्यात्मिक पहलू के साथ जोड़ते हुए, “राम नाम” को चुनावी हथियार बनाने का आरोप लगाया।
केजरीवाल का संदेश और कार्रवाई
केजरीवाल ने X (पूर्व ट्विटर) पर लिखा, “आज हमने संध्या‑कंद का पाठ किया और यह संकल्प किया कि जो लोग हमारे ‘पवित्र राम घर’ से दान लूटते हैं, उन्हें फांसी की सजा मिलनी चाहिए।” यह बयान न केवल धार्मिक भावनाओं को छेड़ता है, बल्कि वैधानिक प्रक्रिया की भी अनदेखी करता है, जिससे कानूनी विशेषज्ञों ने इस बयान की संवैधानिकता पर प्रश्न उठाए।
BJP की प्रतिक्रिया
दिल्ली भाजपा अध्यक्ष हर्ष मल्होत्रा ने केजरीवाल को “राजनीतिक हिन्दू” कहा और संध्या‑कंद पाठ को “राजनीतिक गिमिक” तथा “नाटकीय” ठहराया। उन्होंने कहा, “केजरीवाल चुनाव के समय ही धर्म को बुलाते हैं, अब फिर से वही चाल दोहराई जा रही है।” मल्होत्रा ने यह भी दावा किया कि जनता इस तरह के ‘धर्म‑आधारित’ प्रदर्शन से थक चुकी है।
भविष्य की संभावना
यह संघर्ष राष्ट्रीय स्तर पर भी प्रभाव डाल सकता है। यदि दान चोरी के आरोपों की जांच सच्ची साबित होती है, तो यह भाजपा के राजनैतिक लाभ को घटा सकता है, जबकि एएपी को ‘धर्मिक संवेदनशीलता’ के आधार पर वोट बैंक सुदृढ़ करने में मदद मिल सकती है। दूसरी ओर, कानूनी प्रक्रिया के बिना फांसी जैसे उपायों की सार्वजनिक घोषणा से सामाजिक तनाव बढ़ सकता है, जिससे न्यायिक निगरानी और सार्वजनिक प्रतिक्रिया दोनों ही तीव्र हो सकते हैं।