नई दिल्ली के जंतर मंतीर में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के मंच पर विजय दहिया के नृत्य वीडियो वायरल हुए हैं, जबकि लद्दाख के पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक अपना 15‑वां उपवास जारी रखे हुए हैं। दहिया ने अपने नृत्य को ‘ब्रह्मनवाद के खिलाफ प्रतिरोध’ बताया, परन्तु वांगचुक की प्रतिक्रिया अभी भी अनिश्चित बनी हुई है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- विजय दहिया ने जंतर मंतीर में नृत्य को प्रतिरोध का साधन कहा।
- सोनम वांगचुक 15 दिन से उपवास कर रहे हैं, कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं।
- प्रदर्शन पर कला, राजनीति और जाति‑संबंधी बहसें तेज़ी से बढ़ी हैं।
नई दिल्ली के जंतर मंतीर में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग के साथ एक विशाल मंच स्थापित किया। इस मंच पर केवल नारे नहीं, बल्कि संगीत और नृत्य भी सुनाई दिया, जहाँ पार्टी के प्रवक्ता विजय दहिया ने “दुनिया का पहला नाचता कार्यकर्ता” बनने का दावा किया।
नृत्य को प्रतिरोध का साधन
दहिया ने इंडिया टुडे डिजिटल को बताया कि नृत्य कोई मनोरंजन नहीं, बल्कि “ब्रह्मनवाद के खिलाफ एक सक्रिय प्रतिरोध” है। वह मानते हैं कि नृत्य द्वारा वह सामाजिक पदानुक्रम को तोड़ते हुए, हाशिए पर रहने वाले वर्गों की आवाज़ को मंच पर लाते हैं। उनका कहना है कि “कला लोगों को जोड़ती है और यही मैं करना चाहता हूँ”।
सोनम वांगचुक का उपवास और प्रतिक्रिया
दहिया के नृत्य के ठीक कुछ मीटर दूर लद्दाख के जलवायु कार्यकर्ता और शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक अपना अनिश्चितकालीन उपवास जारी रखे हुए हैं। 15वें दिन में भी उन्होंने नृत्य को नज़रअंदाज़ कर लिया है, जिससे सोशल मीडिया पर यह प्रश्न उठ रहा है कि क्या दोहरे संदेश (नृत्य बनाम उपवास) आंदोलन की गंभीरता को कम कर रहे हैं। दहिया का कहना है कि “वांगचुक सर हमारे नृत्य का आनंद लेते हैं और कभी परेशान नहीं हुए”।
इतिहास में नृत्य और प्रतिरोध
नृत्य को लेकर ऐतिहासिक झुंझलाहट नई बात नहीं है। लियो टॉल्स्टॉय और ओलिवर क्रॉमवेल जैसे यूरोपीय विचारकों ने इसे ‘फुर्सत का शौक’ कहा था। भारत में भी कई सामाजिक आंदोलनों ने नृत्य, गीत और नाटक को प्रेरणा के स्रोत के रूप में अपनाया है—जैसे 1970‑80 के छात्र आंदोलन और वर्तमान में कई स्ट्रीट थिएटर समूह। दहिया इस परिप्रेक्ष्य को उजागर करते हुए कहते हैं कि “निचली जातियों का नृत्य हमेशा सामाजिक बदलाव का हथियार रहा है”।
समालोचना और सामाजिक विमर्श
दहिया के 2017 के एक संगीत वीडियो में शिव‑पार्वती की छवि को लेकर सोशल मीडिया पर नई आलोचना भी आई। आलोचकों का मानना है कि इस तरह के प्रदर्शन आंदोलन की गंभीरता को कम कर सकते हैं, विशेषकर जब एक प्रमुख कार्यकर्ता उपवास कर रहा हो। दहिया इन आरोपों को “जाति‑संबंधी सामाजिक सोच” के रूप में खारिज करते हैं और कहते हैं कि “नृत्य सकारात्मक ऊर्जा देता है और आंदोलन को जीवंत रखता है”।
जैसे-जैसे CJP का प्रदर्शन राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन रहा है, यह स्पष्ट है कि कला, राजनीति और सामाजिक संरचनाओं के बीच का टकराव आगे भी जारी रहेगा।